श्री राधासुधानिधि: श्लोक अर्थ सहित

श्रीराधासुधानिधि: श्री हित हरिवंश महाप्रभु रचित श्रीराधा की संस्कृत स्तुति, राधावल्लभ परंपरा के केंद्र में। हर श्लोक नीचे देवनागरी में, अंग्रेज़ी अक्षरों में और सरल अर्थ के साथ है, और हर श्लोक का अपना पृष्ठ भी है। पाठ हमने स्वयं टाइप किया है और हर श्लोक को 1950 के मुद्रित संस्करण से मिलाया है।

अंतिम अपडेट 30 अक्टूबर 2026
यहाँ श्लोक 1 से 270, सम्पूर्ण
रचयिता श्री हित हरिवंश
भाषा संस्कृत
मिलान 1950 का मुद्रित संस्करण
पाठ

श्रीराधासुधानिधि, श्लोक दर श्लोक

हर श्लोक पहले देवनागरी में, फिर अंग्रेज़ी अक्षरों में, फिर सरल शब्दों में उसका भाव। अर्थ हमारे अपने संक्षिप्त शब्दों में है, शब्दशः अनुवाद नहीं। किसी संख्या पर टैप करके वह श्लोक उसके अपने पृष्ठ पर खोलें।

यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ
धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी ।
योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि
तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि ॥ १ ॥ (1)

yasyaah kadaapi vasanaanchalakhelanottha
dhanyaatidhanyapavanena kritaarthamaanee
yogeendradurgamagatirmadhusoodano'pi
tasyaa namo'stu vrishabhaanubhuvo dishe'pi

योगियों को भी दुर्लभ श्रीकृष्ण स्वयं को धन्य मानते हैं जब उनके वस्त्र के आँचल की हवा उन्हें छू जाती है। वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधा जिस दिशा में हैं, मैं उस दिशा को भी प्रणाम करता हूँ।

ब्रह्मेश्वरादिसुदुरूहपदारविन्द
श्रीमत्परागपरमाद्भुतवैभवायाः ।
सर्वार्थसाररसवर्षिकृपार्द्रदृष्टेस्
तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो महिम्ने ॥ २ ॥ (2)

brahmeshvaraadisuduroohapadaaravinda
shreematparaagaparamaadbhutavaibhavaayaah
sarvaarthasaararasavarshikripaardradrishtes
tasyaa namo'stu vrishabhaanubhuvo mahimne

जिनके चरण-कमल ब्रह्मा और शिव के लिए भी दुर्बोध हैं, जिनके चरणों का पराग अद्भुत वैभव वाला है, और जिनकी कृपा-भीगी दृष्टि सब अर्थों के सार प्रेम की वर्षा करती है, उन वृषभानु-नन्दिनी की महिमा को प्रणाम।

यो ब्रह्मरुद्रशुकनारदभीष्ममुख्यैर्
आलक्षितो न सहसा पुरुषस्य तस्य ।
सद्योवशीकरणचूर्णमनन्तशक्तिं
तं राधिकाचरणरेणुमनुस्मरामि ॥ ३ ॥ (3)

yo brahmarudrashukanaaradabheeshmamukhyair
aalakshito na sahasaa purushasya tasya
sadyovasheekaranachoornamanantashaktim
tam raadhikaacharanarenumanusmaraami

जो परम पुरुष ब्रह्मा, रुद्र, शुकदेव, नारद और भीष्म को भी सहज नहीं दिखते, उन्हें तत्काल वश में करने वाली अनंत शक्ति वाली श्रीराधा-चरण-रज का मैं स्मरण करता हूँ।

आधाय मूर्धनि यदापुरुदारगोप्यः
काम्यं पदं प्रियगुणैरपि पिच्छमौलेः ।
भावोत्सवेन भजतां रसकामधेनुं
तं राधिकाचरणरेणुमहं स्मरामि ॥ ४ ॥ (4)

aadhaaya moordhani yadaapurudaaragopyah
kaamyam padam priyagunairapi pichchhamauleh
bhaavotsavena bhajataam rasakaamadhenum
tam raadhikaacharanarenumaham smaraami

जिस चरण-रज को उदार गोपियों ने सिर पर धारण करके मोर-मुकुटधारी के प्रिय गुणों सहित मनचाहा पद पाया, और जो भाव से भजने वालों के लिए रस की कामधेनु है, उस श्रीराधा-चरण-रज का मैं स्मरण करता हूँ।

दिव्यप्रमोदरससारनिजाङ्गसङ्ग
पीयूषवीचिनिचयैरभिषेचयन्ती ।
कन्दर्पकोटिशरमूर्च्छितनन्दसूनु
सञ्जीवनी जयति कापि निकुञ्जदेवी ॥ ५ ॥ (5)

divyapramodarasasaaranijaangasanga
peeyooshaveechinichayairabhishechayantee
kandarpakotisharamoorchchhitanandasoonu
sanjeevanee jayati kaapi nikunjadevee

करोड़ों कामदेवों के बाणों से मूर्च्छित नन्दनन्दन को जो अपने अंग-संग के अमृत की लहरों से सींचकर जीवन देती हैं, उन अनिर्वचनीय निकुञ्ज-देवी की जय हो।

तन्नः प्रतिक्षणचमत्कृतचारुलीला
लावण्यमोहनमहामधुराङ्गभङ्गि ।
राधाननं हि मधुराङ्गकलानिधान
माविर्भविष्यति कदा रससिन्धुसारम् ॥ ६ ॥ (6)

tannah pratikshanachamatkritachaaruleelaa
laavanyamohanamahaamadhuraangabhangi
raadhaananam hi madhuraangakalaanidhaana
maavirbhavishyati kadaa rasasindhusaaram

जिस मुख से हर क्षण नई-नई मनोहर लीलाओं की शोभा प्रकट होती है, जो सब मधुर अंग-कलाओं का भंडार और रस-सागर का सार है, वह श्रीराधा का मुख हमारे सामने कब प्रकट होगा?

यत्किङ्करीषु बहुशः खलु काकुवाणी
नित्यं परस्य पुरुषस्य शिखण्डमौलेः ।
तस्याः कदा रसनिधेर्वृषभानुजाया
स्तत्केलिकुञ्जभवनाङ्गणमार्जनी स्याम् ॥ ७ ॥ (7)

yatkinkareeshu bahushah khalu kaakuvaanee
nityam parasya purushasya shikhandamauleh
tasyaah kadaa rasanidhervrishabhaanujaayaa
statkelikunjabhavanaanganamaarjanee syaam

जिनकी दासियों से स्वयं मोर-मुकुटधारी श्रीकृष्ण बार-बार विनती करते हैं, उन रसनिधि वृषभानु-नन्दिनी के केलि-कुञ्ज के आँगन को बुहारने वाली मैं कब बनूँगी?

वृन्दानि सर्वमहतामपहाय दूराद्
वृन्दाटवीमनुसर प्रणयेन चेतः ।
सत्तारणीकृतसुभावसुधारसौघं
राधाभिधानमिह दिव्यनिधानमस्ति ॥ ८ ॥ (8)

vrindaani sarvamahataamapahaaya dooraad
vrindaataveemanusara pranayena chetah
sattaaraneekritasubhaavasudhaarasaugham
raadhaabhidhaanamiha divyanidhaanamasti

हे मन! सारी महानताओं को दूर से छोड़कर प्रेम से वृंदावन का अनुसरण कर। यहाँ राधा नाम की एक दिव्य निधि है, जो भाव-सुधा का प्रवाह है और सज्जनों को पार लगाती है।

केनापि नागरवरेण पदे निपत्य
सम्प्रार्थितैकपरिरम्भरसोत्सवायाः ।
सभ्रूविभङ्गमतिरङ्गनिधेः कदा ते
श्रीराधिके नहि नहीति गिरः शृणोमि ॥ ९ ॥ (9)

kenaapi naagaravarena pade nipatya
sampraarthitaikaparirambharasotsavaayaah
sabhroovibhangamatiranganidheh kadaa te
shreeraadhike nahi naheeti girah shrinomi

कोई चतुर-शिरोमणि नागर आपके चरणों में गिरकर आलिंगन की याचना कर रहे हों और आप भौंहें चलाकर कहें "नहीं, नहीं"। हे श्रीराधिके, मैं आपके ये शब्द कब सुनूँगी?

यत्पादपद्मनखचन्द्रमणिच्छटाया
विस्फूर्जितं किमपि गोपवधूष्वदर्शि ।
पूर्णानुरागरससागरसारमूर्तिः
सा राधिका मयि कदापि कृपां करोतु ॥ १० ॥ (10)

yatpaadapadmanakhachandramanichchhataayaa
visphoorjitam kimapi gopavadhooshvadarshi
poornaanuraagarasasaagarasaaramoortih
saa raadhikaa mayi kadaapi kripaam karotu

जिनके चरण-नखों की चन्द्रमणि की एक किरण का प्रकाश गोप-वधुओं में दिखाई देता है, वही पूर्ण अनुराग-रस-सागर की सार-मूर्ति श्रीराधिका कभी मुझ पर भी कृपा करें।

उज्जृम्भमाणरसवारिनिधेस्तरङ्गै
रङ्गैरिव प्रणयलोलविलोचनायाः ।
तस्याः कदा नु भविता मयि पुण्यदृष्टि
र्वृन्दाटवीनवनिकुञ्जगृहाधिदेव्याः ॥ ११ ॥ (11)

ujjrimbhamaanarasavaarinidhestarangai
rangairiva pranayalolavilochanaayaah
tasyaah kadaa nu bhavitaa mayi punyadrishti
rvrindaataveenavanikunjagrihaadhidevyaah

जिनके नेत्र प्रेम से चंचल हैं और अंग उमड़ते रस-सागर की तरंगों जैसे हैं, उन वृंदावन के नव-निकुञ्ज की अधिष्ठात्री देवी की पवित्र दृष्टि मुझ पर कब होगी?

वृन्दावनेश्वरि तवैव पदारविन्दं
प्रेमामृतैकमकरन्दरसौघपूर्णम् ।
हृद्यर्पितं मधुपतेः स्मरतापमुग्रं
निर्वापयत्परमशीतलमाश्रयामि ॥ १२ ॥ (12)

vrindaavaneshvari tavaiva padaaravindam
premaamritaikamakarandarasaughapoornam
hridyarpitam madhupateh smarataapamugram
nirvaapayatparamasheetalamaashrayaami

हे वृंदावनेश्वरी! आपके चरण-कमल ही प्रेमामृत के मकरंद से भरे हैं; हृदय पर रखते ही वे श्रीकृष्ण का तीव्र ताप शांत कर देते हैं। मैं उन्हीं परम शीतल चरणों का आश्रय लेता हूँ।

राधाकरावचितपल्लववल्लरीके
राधापदाङ्कविलसन्मधुरस्थलीके ।
राधायशोमुखरमत्तखगावलीके
राधाविहारविपिने रमतां मनो मे ॥ १३ ॥ (13)

raadhaakaraavachitapallavavallareeke
raadhaapadaankavilasanmadhurasthaleeke
raadhaayashomukharamattakhagaavaleeke
raadhaavihaaravipine ramataam mano me

जहाँ की लताओं के पत्ते श्रीराधा ने तोड़े हैं, जहाँ की भूमि उनके चरण-चिह्नों से शोभित है, जहाँ पक्षी उनका यश गाते हैं, राधा के उस विहार-वन में मेरा मन रमे।

कृष्णामृतं चल विगाढुमितीरिताहं
तावत्सहस्व रजनी सखि यावदेति ।
इत्थं विहस्य वृषभानुसुतेह लप्स्ये
मानं कदा रसदकेलिकदम्बजातम् ॥ १४ ॥ (14)

krishnaamritam chala vigaadhumiteeritaaham
taavatsahasva rajanee sakhi yaavadeti
ittham vihasya vrishabhaanusuteha lapsye
maanam kadaa rasadakelikadambajaatam

जब वे कहेंगी "सखी, कृष्णा (यमुना) में स्नान करने चल", तब मैं हँसकर कहूँगी "रात होने तक धैर्य रखो"। ऐसे हास-परिहास से मिलने वाला उनका प्यार भरा मान मुझे कब मिलेगा?

पादाङ्गुलीनिहितदृष्टिमपत्रपिष्णुं
दूरादुदीक्ष्य रसिकेन्द्रमुखेन्दुबिम्बम् ।
वीक्षे चलत्पदगतिं चरिताभिरामां
झङ्कारनूपुरवतीं बत कर्हि राधाम् ॥ १५ ॥ (15)

paadaanguleenihitadrishtimapatrapishnum
dooraadudeekshya rasikendramukhendubimbam
veekshe chalatpadagatim charitaabhiraamaam
jhankaaranoopuravateem bata karhi raadhaam

दूर से प्रियतम का मुख देखकर जिन्होंने लज्जा से दृष्टि अपने पैरों की उँगलियों पर टिका दी और मंद गति से चल पड़ीं, जिनके नूपुर झंकार उठे, उन श्रीराधा के दर्शन मुझे कब होंगे?

उज्जागरं रसिकनागरसङ्गरङ्गैः
कुञ्जोदरे कृतवती नु मुदा रजन्याम् ।
सुस्नापिता हि मधुनैव सुभोजिता त्वं
राधे कदा स्वपिषि मत्करलालिताङ्घ्रिः ॥ १६ ॥ (16)

ujjaagaram rasikanaagarasangarangaih
kunjodare kritavatee nu mudaa rajanyaam
susnaapitaa hi madhunaiva subhojitaa tvam
raadhe kadaa svapishi matkaralaalitaanghrih

हे राधे! प्रियतम के साथ कुञ्ज में रात भर जागने के बाद, मेरे हाथों स्नान और मधुर भोजन करके, जब मैं आपके चरण दबा रही होऊँ, आप कब सोएँगी?

वैदग्ध्यसिन्धुरनुरागरसैकसिन्धु
र्वात्सल्यसिन्धुरतिसान्द्रकृपैकसिन्धुः ।
लावण्यसिन्धुरमृतच्छविरूपसिन्धुः
श्रीराधिका स्फुरतु मे हृदि केलिसिन्धुः ॥ १७ ॥ (17)

vaidagdhyasindhuranuraagarasaikasindhu
rvaatsalyasindhuratisaandrakripaikasindhuh
laavanyasindhuramritachchhaviroopasindhuh
shreeraadhikaa sphuratu me hridi kelisindhuh

जो चातुर्य, अनुराग, वात्सल्य, घनी कृपा, लावण्य और अमृत-छवि की सिन्धु हैं, वे केलि-सिन्धु श्रीराधिका मेरे हृदय में प्रकाशित हों।

दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी
वेणुध्वनिं क्व च निशम्य च विह्वलाङ्गी ।
सा श्यामसुन्दरगुणैरनुगीयमानैः
प्रीता परिष्वजतु मां वृषभानुपुत्री ॥ १८ ॥ (18)

drishtvaiva champakalateva chamatkritaangee
venudhvanim kva cha nishamya cha vihvalaangee
saa shyaamasundaragunairanugeeyamaanaih
preetaa parishvajatu maam vrishabhaanuputree

प्रियतम को देखते ही चम्पक-लता की तरह पुलकित और बंसी सुनकर विह्वल होने वाली वृषभानु-पुत्री, मेरे द्वारा श्यामसुंदर के गुण गाए जाने पर प्रसन्न होकर मुझे गले लगाएँ।

श्रीराधिके सुरतरङ्गिनितम्बभागे
काञ्चीकलापकलहंसकलानुलापैः ।
मञ्जीरसिञ्जितमधुव्रतगुञ्जिताङ्घ्रि
पङ्केरुहैः शिशिरयस्व रसच्छटाभिः ॥ १९ ॥ (19)

shreeraadhike surataranginitambabhaage
kaancheekalaapakalahamsakalaanulaapaih
manjeerasinjitamadhuvratagunjitaanghri
pankeruhaih shishirayasva rasachchhataabhih

हे श्रीराधिके! आपकी करधनी की ध्वनि हंसों के कलरव जैसी है और चरण-कमलों के नूपुर भौंरों के गुंजन जैसे हैं। अपने उसी रस की छटा से मुझे शीतल कर दीजिए।

श्रीराधिके सुरतरङ्गिणि दिव्यकेलि
कल्लोलमालिनि लसद्वदनारविन्दे ।
श्यामामृताम्बुनिधिसङ्गमतीव्रवेगि
न्यावर्तनाभिरुचिरे मम सन्निधेहि ॥ २० ॥ (20)

shreeraadhike suratarangini divyakeli
kallolamaalini lasadvadanaaravinde
shyaamaamritaambunidhisangamateevravegi
nyaavartanaabhiruchire mama sannidhehi

हे श्रीराधिके! आप दिव्य केलि की लहरों वाली देव-नदी हैं, आपका मुख कमल है, और आप श्याम-सुधा-सागर से मिलने को तीव्र वेग से बहती हैं। कृपा करके मेरे निकट रहिए।

सत्प्रेमसिन्धुमकरन्दरसौघधारा
सारानजस्रमभितः स्रवदाश्रितेषु ।
श्रीराधिके तव कदा चरणारविन्दं
गोविन्दजीवनधनं शिरसा वहामि ॥ २१ ॥ (21)

satpremasindhumakarandarasaughadhaaraa
saaraanajasramabhitah sravadaashriteshu
shreeraadhike tava kadaa charanaaravindam
govindajeevanadhanam shirasaa vahaami

आपके चरण-कमल आश्रितों पर सत्प्रेम के मकरंद-रस की धारा निरंतर बरसाते हैं। हे श्रीराधिके, गोविन्द के जीवन-धन उन चरणों को मैं कब सिर पर धारण करूँगी?

सङ्केतकुञ्जमनुकुञ्जरमन्दगामि
न्यादाय दिव्यमृदुचन्दनगन्धमाल्यम् ।
त्वां कामकेलिरभसेन कदा चलन्तीं
राधेऽनुयामि पदवीमुपदर्शयन्ती ॥ २२ ॥ (22)

sanketakunjamanukunjaramandagaami
nyaadaaya divyamriduchandanagandhamaalyam
tvaam kaamakelirabhasena kadaa chalanteem
raadhe'nuyaami padaveemupadarshayantee

हे राधे! जब आप उत्कण्ठा से भरकर संकेत-कुञ्ज की ओर मंद गति से जा रही हों और मैं चंदन, सुगंध और मालाएँ लेकर आपको राह दिखाती चलूँ, ऐसी कृपा कब होगी?

गत्वा कलिन्दतनयाविजनावतार
मुद्वर्तयन्त्यमृतमङ्गमनङ्गजीवम् ।
श्रीराधिके तव कदा नवनागरेन्द्रं
पश्यामि मग्ननयनं स्थितमुच्चनीपे ॥ २३ ॥ (23)

gatvaa kalindatanayaavijanaavataara
mudvartayantyamritamangamanangajeevam
shreeraadhike tava kadaa navanaagarendram
pashyaami magnanayanam sthitamuchchaneepe

यमुना के किसी निर्जन घाट पर मैं आपके अंगों पर उबटन लगा रही होऊँ और ऊँचे कदम्ब पर बैठे नव-नागर श्रीकृष्ण को आपको निहारते देखूँ, हे श्रीराधिके, ऐसा कब होगा?

सत्प्रेमराशिसरसो विकसत्सरोजं
स्वानन्दसीधुरससिन्धुविवर्धनेन्दुम् ।
तच्छ्रीमुखं कुटिलकुन्तलभृङ्गजुष्टं
श्रीराधिके तव कदा नु विलोकयिष्ये ॥ २४ ॥ (24)

satpremaraashisaraso vikasatsarojam
svaanandaseedhurasasindhuvivardhanendum
tachchhreemukham kutilakuntalabhringajushtam
shreeraadhike tava kadaa nu vilokayishye

आपका मुख प्रेम-सरोवर का खिला कमल है, आनंद-सिन्धु को बढ़ाने वाला चन्द्रमा है, और घुँघराली लटें उस पर भौंरों जैसी हैं। हे श्रीराधिके, उस मुख का दर्शन मैं कब करूँगी?

लावण्यसाररससारसुखैकसारे
कारुण्यसारमधुरच्छविरूपसारे ।
वैदग्ध्यसाररतिकेलिविलाससारे
राधाभिधे मम मनोऽखिलसारसारे ॥ २५ ॥ (25)

laavanyasaararasasaarasukhaikasaare
kaarunyasaaramadhurachchhaviroopasaare
vaidagdhyasaararatikelivilaasasaare
raadhaabhidhe mama mano'khilasaarasaare

जो लावण्य, रस और सुख का सार है, करुणा और मधुर छवि का सार है, चातुर्य और केलि-विलास का सार है, सब सारों के सार उस राधा नामक स्वरूप में मेरा मन रमे।

चिन्तामणिः प्रणमतां व्रजनागरीणां
चूडामणिः कुलमणिर्वृषभानुनाम्नः ।
सा श्यामकामवरशान्तिमणिर्निकुञ्ज
भूषामणिर्हृदयसम्पुटसन्मणिर्नः ॥ २६ ॥ (26)

chintaamanih pranamataam vrajanaagareenaam
choodaamanih kulamanirvrishabhaanunaamnah
saa shyaamakaamavarashaantimanirnikunja
bhooshaamanirhridayasamputasanmanirnah

वे प्रणाम करने वालों के लिए चिन्तामणि, ब्रज-नागरियों की चूड़ामणि और वृषभानु-कुल की मणि हैं; श्याम की कामना शांत करने वाली, निकुञ्ज की भूषण और हमारे हृदय-सम्पुट की सच्ची मणि वही हैं।

मञ्जुस्वभावमधिकल्पलतानिकुञ्जं
व्यञ्जन्तमद्भुतकृपारसपुञ्जमेव ।
प्रेमामृताम्बुधिमगाधमबाधमेतं
राधाभिधं द्रुतमुपाश्रय साधु चेतः ॥ २७ ॥ (27)

manjusvabhaavamadhikalpalataanikunjam
vyanjantamadbhutakripaarasapunjameva
premaamritaambudhimagaadhamabaadhametam
raadhaabhidham drutamupaashraya saadhu chetah

जिनका स्वभाव कोमल है और जो कल्पलता के निकुञ्ज में अद्भुत कृपा-रस बरसाती हैं, हे मेरे साधु मन, उस राधा नाम के अगाध, असीम प्रेम-सागर का शीघ्र आश्रय ले।

श्रीराधिकां निजविटेन सहालपन्तीं
शोणाधरप्रसृमरच्छविमञ्जरीकाम् ।
सिन्दूरसंवलितमौक्तिकपङ्क्तिशोभां
यो भावयेद्दशनकुन्दवतीं स धन्यः ॥ २८ ॥ (28)

shreeraadhikaam nijavitena sahaalapanteem
shonaadharaprasrimarachchhavimanjareekaam
sindoorasamvalitamauktikapanktishobhaam
yo bhaavayeddashanakundavateem sa dhanyah

धन्य है वह जो प्रियतम से बात करती हुई श्रीराधिका का ध्यान करे, जिनके लाल होठों की छवि फैल रही है, माँग में सिंदूर मिले मोती शोभित हैं और दाँत कुंद-कलियों जैसे हैं।

पीतारुणच्छविमनन्ततडिल्लताभां
प्रौढानुरागमदविह्वलचारुमूर्तिम् ।
प्रेमास्पदां व्रजमहीपतितन्महिष्यो
र्गोविन्दवन्मनसि तां निदधामि राधाम् ॥ २९ ॥ (29)

peetaarunachchhavimanantatadillataabhaam
praudhaanuraagamadavihvalachaarumoortim
premaaspadaam vrajamaheepatitanmahishyo
rgovindavanmanasi taam nidadhaami raadhaam

जिनकी छवि सुनहरी-अरुण है, आभा अनंत बिजली जैसी है, रूप प्रौढ़ अनुराग से विह्वल है, और जो ब्रजराज और ब्रजरानी को गोविन्द के समान प्रिय हैं, उन श्रीराधा को मैं मन में धारण करता हूँ।

निर्माय चारुमुकुटं नवचन्द्रकेण
गुञ्जाभिरारचितहारमुपाहरन्ती ।
वृन्दाटवीनवनिकुञ्जगृहाधिदेव्याः
श्रीराधिके तव कदा भवितास्मि दासी ॥ ३० ॥ (30)

nirmaaya chaarumukutam navachandrakena
gunjaabhiraarachitahaaramupaaharantee
vrindaataveenavanikunjagrihaadhidevyaah
shreeraadhike tava kadaa bhavitaasmi daasee

मोर-पंखों का सुंदर मुकुट और गुंजा की माला बनाकर आपको भेंट करती हुई, हे वृंदावन के निकुञ्ज की अधिदेवी श्रीराधिके, मैं आपकी दासी कब बनूँगी?

सङ्केतकुञ्जमनुपल्लवमास्तरीतुं
तत्तत्प्रसादमभितः खलु संवरीतुम् ।
त्वां श्यामचन्द्रमभिसारयितुं धृताशे
श्रीराधिके मयि विधेहि कृपाकटाक्षम् ॥ ३१ ॥ (31)

sanketakunjamanupallavamaastareetum
tattatprasaadamabhitah khalu samvareetum
tvaam shyaamachandramabhisaarayitum dhritaashe
shreeraadhike mayi vidhehi kripaakataaksham

मैं यही आशा रखती हूँ कि संकेत-कुञ्ज में नए पत्तों की शय्या बिछाऊँ, चारों ओर सब सँवारूँ और आपको श्यामचन्द्र से मिलाने ले चलूँ। हे श्रीराधिके, मुझ पर कृपा-कटाक्ष कीजिए।

दूरादपास्य स्वजनान्सुखमर्थकोटिं
सर्वेषु साधनवरेषु चिरं निराशः ।
वर्षन्तमेव सहजाद्भुतसौख्यधारां
श्रीराधिकाचरणरेणुमहं स्मरामि ॥ ३२ ॥ (32)

dooraadapaasya svajanaansukhamarthakotim
sarveshu saadhanavareshu chiram niraashah
varshantameva sahajaadbhutasaukhyadhaaraam
shreeraadhikaacharanarenumaham smaraami

अपने स्वजन, सुख और करोड़ों संपत्तियाँ दूर से छोड़कर, सब श्रेष्ठ साधनों से निराश होकर, मैं सहज अद्भुत सुख की धारा बरसाने वाली श्रीराधिका-चरण-रज का स्मरण करता हूँ।

वृन्दाटवीप्रकटमन्मथकोटिमूर्तेः
कस्यापि गोकुलकिशोरनिशाकरस्य ।
सर्वस्वसम्पुटमिव स्तनशातकुम्भ
कुम्भद्वयं स्मर मनो वृषभानुपुत्र्याः ॥ ३३ ॥ (33)

vrindaataveeprakatamanmathakotimoorteh
kasyaapi gokulakishoranishaakarasya
sarvasvasamputamiva stanashaatakumbha
kumbhadvayam smara mano vrishabhaanuputryaah

इस श्लोक में संस्कृत श्रृंगार-काव्य की भाषा में श्रीराधा के रूप-सौंदर्य का वर्णन है, और उन्हें वृंदावन में प्रकट गोकुल-चन्द्र श्रीकृष्ण का सर्वस्व बताया गया है।

सान्द्रानुरागरससारसरःसरोजं
किं वा द्विधा मुकुलितं मुखचन्द्रभासा ।
तन्नूतनस्तनयुगं वृषभानुजायाः
स्वानन्दसीधुमकरन्दघनं स्मरामि ॥ ३४ ॥ (34)

saandraanuraagarasasaarasarahsarojam
kim vaa dvidhaa mukulitam mukhachandrabhaasaa
tannootanastanayugam vrishabhaanujaayaah
svaanandaseedhumakarandaghanam smaraami

इसी श्रृंगार-भाषा में कवि उनके सौंदर्य को प्रेम-सरोवर के कमल से उपमा देते हैं, जो मुख-चन्द्र की चाँदनी से दो रूपों में खिल उठा है और आनंद-मकरंद से भरा है।

क्रीडासरःकनकपङ्कजकुड्मलाय
स्वानन्दपूर्णरसकल्पतरोः फलाय ।
तस्मै नमो भुवनमोहनमोहनाय
श्रीराधिके तव नवस्तनमण्डलाय ॥ ३५ ॥ (35)

kreedaasarahkanakapankajakudmalaaya
svaanandapoornarasakalpataroh phalaaya
tasmai namo bhuvanamohanamohanaaya
shreeraadhike tava navastanamandalaaya

फिर शास्त्रीय काव्य की भाषा में कवि उनके नवयौवन-सौंदर्य को केलि-सरोवर की सुनहरी कमल-कली और आनंद-कल्पतरु का फल कहकर प्रणाम करते हैं, जो श्रीकृष्ण को भी मोहित करता है।

पत्रावलीं रचयितुं कुचयोः कपोले
बद्धुं विचित्रकवरीं नवमल्लिकाभिः ।
अङ्गं च भूषयितुमाभरणैर्धृताशे
श्रीराधिके मयि विधेहि कृपावलोकम् ॥ ३६ ॥ (36)

patraavaleem rachayitum kuchayoh kapole
baddhum vichitrakavareem navamallikaabhih
angam cha bhooshayitumaabharanairdhritaashe
shreeraadhike mayi vidhehi kripaavalokam

मैं आपके कपोलों पर पत्रावली रचने, नई मल्लिका से आपकी वेणी गूँथने और आपके अंगों को आभूषणों से सजाने की आशा रखती हूँ। हे श्रीराधिके, मुझ पर कृपा-दृष्टि कीजिए।

श्यामेति सुन्दरवरेति मनोहरेति
कन्दर्पकोटिललितेति सुनागरेति ।
सोत्कण्ठमह्नि गृणती मुहुराकुलाक्षी
सा राधिका मयि कदा नु भवेत्प्रसन्ना ॥ ३७ ॥ (37)

shyaameti sundaravareti manohareti
kandarpakotilaliteti sunaagareti
sotkanthamahni grinatee muhuraakulaakshee
saa raadhikaa mayi kadaa nu bhavetprasannaa

"हे श्याम! हे सुंदरवर! हे मनोहर! हे करोड़ों कामदेवों से सुंदर! हे चतुर-शिरोमणि!" दिन में बार-बार उत्कण्ठा से पुकारती आकुल-नयनी श्रीराधिका मुझ पर कब प्रसन्न होंगी?

वेणुः करान्निपतितः स्खलितं शिखण्डं
भ्रष्टं च पीतवसनं व्रजराजसूनोः ।
यस्याः कटाक्षशरपातविमूर्च्छितस्य
तां राधिकां परिचरामि कदा रसेन ॥ ३८ ॥ (38)

venuh karaannipatitah skhalitam shikhandam
bhrashtam cha peetavasanam vrajaraajasoonoh
yasyaah kataakshasharapaatavimoorchchhitasya
taam raadhikaam paricharaami kadaa rasena

जिनके कटाक्ष-बाण से मूर्च्छित होकर ब्रजराज-कुमार की बंसी हाथ से गिर जाती है, मोर-मुकुट खिसक जाता है और पीताम्बर गिर पड़ता है, उन श्रीराधिका की सेवा मैं प्रेम से कब करूँगी?

तस्या अपाररससारविलासमूर्ते
रानन्दकन्दपरमाद्भुतसौम्यलक्ष्म्याः ।
ब्रह्मादिदुर्गमगतेर्वृषभानुजायाः
कैङ्कर्यमेव मम जन्मनि जन्मनि स्यात् ॥ ३९ ॥ (39)

tasyaa apaararasasaaravilaasamoorte
raanandakandaparamaadbhutasaumyalakshmyaah
brahmaadidurgamagatervrishabhaanujaayaah
kainkaryameva mama janmani janmani syaat

जो अपार रस-सार की विलास-मूर्ति, आनंद की जड़ और अद्भुत सौम्य शोभा हैं, और जिनकी गति ब्रह्मा आदि को भी दुर्गम है, उन वृषभानु-नन्दिनी की सेवा मुझे जन्म-जन्म मिलती रहे।

पूर्णानुरागरसमूर्तितडिल्लताभं
ज्योतिः परं भगवतो रतिमद्रहस्यम् ।
यत्प्रादुरस्ति कृपया वृषभानुगेहे
स्यात्किङ्करी भवितुमेव ममाभिलाषः ॥ ४० ॥ (40)

poornaanuraagarasamoortitadillataabham
jyotih param bhagavato ratimadrahasyam
yatpraadurasti kripayaa vrishabhaanugehe
syaatkinkaree bhavitumeva mamaabhilaashah

पूर्ण अनुराग-रस की मूर्ति, बिजली जैसी उज्ज्वल, भगवान की परम रहस्यमयी ज्योति कृपा करके वृषभानु के घर प्रकट हुई है। मेरी यही अभिलाषा है कि मैं उनकी दासी बनूँ।

प्रेमोल्लसद्रसविलासविकासकन्दं
गोविन्दलोचनवितृप्तचकोरपेयम् ।
सिञ्चन्तमद्भुतरसामृतचन्द्रकौघैः
श्रीराधिकावदनचन्द्रमहं स्मरामि ॥ ४१ ॥ (41)

premollasadrasavilaasavikaasakandam
govindalochanavitriptachakorapeyam
sinchantamadbhutarasaamritachandrakaughaih
shreeraadhikaavadanachandramaham smaraami

जो प्रेम-विलास के विकास का मूल है, गोविन्द के कभी न तृप्त होने वाले चकोर-नेत्रों का पेय है और अद्भुत रसामृत की चाँदनी बरसाता है, श्रीराधिका के उस मुख-चन्द्र का मैं स्मरण करता हूँ।

सङ्केतकुञ्जनिलये मृदुपल्लवेन
क्लृप्ते कदापि नवसङ्गभयत्रपाढ्याम् ।
अत्याग्रहेण करवारिरुहे गृहीत्वा
नेष्ये विटेन्द्रशयने वृषभानुपुत्रीम् ॥ ४२ ॥ (42)

sanketakunjanilaye mridupallavena
klripte kadaapi navasangabhayatrapaadhyaam
atyaagrahena karavaariruhe griheetvaa
neshye vitendrashayane vrishabhaanuputreem

संकेत-कुञ्ज में कोमल पत्तों से बनी शय्या की ओर, नए मिलन के भय और लाज से भरी वृषभानु-पुत्री का कर-कमल पकड़कर बड़े आग्रह से मैं उन्हें कब ले जाऊँगी?

सद्गन्धमाल्यनवचन्द्रलवङ्गसङ्ग
ताम्बूलसम्पुटमधीश्वरि मां वहन्तीम् ।
श्यामं तमुन्मदरसादभिसंसरन्ती
श्रीराधिके करुणयानुचरीं विधेहि ॥ ४३ ॥ (43)

sadgandhamaalyanavachandralavangasanga
taamboolasamputamadheeshvari maam vahanteem
shyaamam tamunmadarasaadabhisamsarantee
shreeraadhike karunayaanuchareem vidhehi

हे अधीश्वरी! जब आप रस से उन्मत्त होकर श्याम के पास जाएँ और मैं सुगंधित मालाएँ और कपूर-लौंग वाले पान का डिब्बा लेकर साथ चलूँ, हे श्रीराधिके, कृपा करके मुझे अपनी ऐसी अनुचरी बनाइए।

श्रीराधिके तव नवोद्गमचारुवृत्त
वक्षोजमेव मुकुलद्वयलोभनीयम् ।
श्रोणीं दधद्रसगुणैरुपचीयमानं
कैशोरकं जयति मोहनचित्तचोरम् ॥ ४४ ॥ (44)

shreeraadhike tava navodgamachaaruvritta
vakshojameva mukuladvayalobhaneeyam
shroneem dadhadrasagunairupacheeyamaanam
kaishorakam jayati mohanachittachoram

शास्त्रीय श्रृंगार-काव्य की भाषा में यह श्लोक श्रीराधा के नवयौवन की शोभा की स्तुति करता है, जो स्वयं श्रीकृष्ण का चित्त चुरा लेती है। उस कैशोर की जय हो।

संलापमुच्छलदनङ्गतरङ्गमाला
संक्षोभितेन वपुषा व्रजनागरेण ।
प्रत्यक्षरं क्षरदपाररसामृताब्धिं
श्रीराधिके तव कदा नु शृणोम्यदूरात् ॥ ४५ ॥ (45)

samlaapamuchchhaladanangatarangamaalaa
samkshobhitena vapushaa vrajanaagarena
pratyaksharam ksharadapaararasaamritaabdhim
shreeraadhike tava kadaa nu shrinomyadooraat

जब आप प्रेम-तरंगों से आन्दोलित ब्रज-नागर से बातें करती हों और हर अक्षर से अपार रसामृत-सागर झरता हो, हे श्रीराधिके, मैं पास रहकर उस संलाप को कब सुनूँगी?

अङ्कस्थितेऽपि दयिते किमपि प्रलापं
हा मोहनेति मधुरं विदधत्यकस्मात् ।
श्यामानुरागमदविह्वलमोहनाङ्गी
श्यामामणिर्जयति कापि निकुञ्जसीम्नि ॥ ४६ ॥ (46)

ankasthite'pi dayite kimapi pralaapam
haa mohaneti madhuram vidadhatyakasmaat
shyaamaanuraagamadavihvalamohanaangee
shyaamaamanirjayati kaapi nikunjaseemni

प्रियतम की गोद में बैठी होकर भी जो अचानक "हा मोहन!" ऐसा मधुर प्रलाप कर उठती हैं, श्याम के अनुराग-मद से विह्वल उन श्यामा-मणि की निकुञ्ज में जय हो।

कुञ्जान्तरे किमपि जातरसोत्सवायाः
श्रुत्वा तदालपितशिञ्जितमिश्रितानि ।
श्रीराधिके तव रहःपरिचारिकाहं
द्वारस्थिता रसह्रदे पतिता कदा स्याम् ॥ ४७ ॥ (47)

kunjaantare kimapi jaatarasotsavaayaah
shrutvaa tadaalapitashinjitamishritaani
shreeraadhike tava rahahparichaarikaaham
dvaarasthitaa rasahrade patitaa kadaa syaam

जब कुञ्ज के भीतर आपके आनंद-उत्सव की बातें और आभूषणों की झंकार सुनाई दे, तब द्वार पर खड़ी आपकी एकांत परिचारिका मैं, हे श्रीराधिके, रस के सरोवर में कब डूब जाऊँगी?

वीणां करे मधुमतीं मधुरस्वरां ता
माधाय नागरशिरोमणिभावलीलाम् ।
गायन्त्यहो दिनमपारमिवाश्रुवर्षै
र्दुःखान्नयन्त्यहह सा हृदि मेऽस्तु राधा ॥ ४८ ॥ (48)

veenaam kare madhumateem madhurasvaraam taa
maadhaaya naagarashiromanibhaavaleelaam
gaayantyaho dinamapaaramivaashruvarshai
rduhkhaannayantyahaha saa hridi me'stu raadhaa

अपनी मधुर स्वर वाली मधुमती वीणा हाथ में लेकर जो नागर-शिरोमणि की भाव-लीलाएँ गाती हैं और आँसुओं की वर्षा में अपार दिन बिताती हैं, अहह, वे श्रीराधा मेरे हृदय में बसें।

अन्योन्यहासपरिहासविलासकेलि
वैचित्र्यजृम्भितमहारसवैभवेन ।
वृन्दावने विलसतापहृतं विदग्ध
द्वन्द्वेन केनचिदहो हृदयं मदीयम् ॥ ४९ ॥ (49)

anyonyahaasaparihaasavilaasakeli
vaichitryajrimbhitamahaarasavaibhavena
vrindaavane vilasataapahritam vidagdha
dvandvena kenachidaho hridayam madeeyam

परस्पर हास-परिहास और केलि की विचित्रता से उमड़े महारस-वैभव के साथ वृंदावन में विहार करने वाले किसी विदग्ध युगल ने मेरा हृदय चुरा लिया है।

महाप्रेमोन्मीलन्नवरससुधासिन्धुलहरी
परीवाहैर्विश्वं स्नपयदिव नेत्रान्तनटनैः ।
तडिन्मालागौरं किमपि नवकैशोरमधुरं
पुरन्ध्रीणां चूडाभरणनवरत्नं विजयते ॥ ५० ॥ (50)

mahaapremonmeelannavarasasudhaasindhulaharee
pareevaahairvishvam snapayadiva netraantanatanaih
tadinmaalaagauram kimapi navakaishoramadhuram
purandhreenaam choodaabharananavaratnam vijayate

जिनके नयनों का नृत्य महाप्रेम के नव-रस-सुधा-सिन्धु की लहरों से मानो संसार को नहला देता है, बिजली की माला जैसी गौर, नव-कैशोर से मधुर, वे नारियों की चूड़ामणि सर्वोपरि हैं।

अमन्दप्रेमाङ्कश्लथसकलनिर्बन्धहृदयं
दयापारं दिव्यच्छविमधुरलावण्यललितम् ।
अलक्ष्यं राधाख्यं निखिलनिगमैरप्यतितरां
रसाम्भोधेः सारं किमपि सुकुमारं विजयते ॥ ५१ ॥ (51)

amandapremaankashlathasakalanirbandhahridayam
dayaapaaram divyachchhavimadhuralaavanyalalitam
alakshyam raadhaakhyam nikhilanigamairapyatitaraam
rasaambhodheh saaram kimapi sukumaaram vijayate

गहन प्रेम के कारण जिनके हृदय के सब आग्रह शिथिल हो गए हैं, जो दया की सीमा हैं और दिव्य छवि के माधुर्य से ललित हैं, समस्त वेदों को भी अलक्ष्य, रस-सागर की सार वह सुकुमारी श्रीराधा विजयी हैं।

दुकूलं बिभ्राणामथ कुचतटे कञ्चुकपटं
प्रसादं स्वामिन्याः स्वकरतलदत्तं प्रणयतः ।
स्थितां नित्यं पार्श्वे विविधपरिचर्यैकचतुरां
किशोरीमात्मानं किमिह सुकुमारीं नु कलये ॥ ५२ ॥ (52)

dukoolam bibhraanaamatha kuchatate kanchukapatam
prasaadam svaaminyaah svakarataladattam pranayatah
sthitaam nityam paarshve vividhaparicharyaikachaturaam
kishoreemaatmaanam kimiha sukumaareem nu kalaye

स्वामिनी के कर-कमलों से प्रेमपूर्वक दिए प्रसाद के वस्त्र धारण किए, सदा उनके पास रहकर हर तरह की सेवा में चतुर, क्या मैं कभी यहाँ स्वयं को ऐसी सुकुमारी किशोरी दासी के रूप में देखूँगी?

विचिन्वन्ती केशान्क्वचन करजैः कञ्चुकपटं
क्व चाप्यामुञ्चन्ती कुचकनकदीव्यत्कलशयोः ।
सुगुल्फे न्यस्यन्ती क्वचन मणिमञ्जीरयुगलं
कदा स्यां श्रीराधे तव सुपरिचारिण्यहमहो ॥ ५३ ॥ (53)

vichinvantee keshaankvachana karajaih kanchukapatam
kva chaapyaamunchantee kuchakanakadeevyatkalashayoh
sugulphe nyasyantee kvachana manimanjeerayugalam
kadaa syaam shreeraadhe tava suparichaarinyahamaho

कभी अपनी उँगलियों से आपके केश सुलझाऊँ, कभी आपको वस्त्र पहनाऊँ, कभी आपके सुंदर टखनों में मणि के नूपुर पहनाऊँ, हे श्रीराधे, मैं आपकी ऐसी परिचारिका कब बनूँगी?

अतिस्नेहादुच्चैरपि च हरिनामानि गृणत
स्तथा सौगन्ध्याद्यैर्बहुभिरुपचारैश्च यजतः ।
परानन्दं वृन्दावनमनुचरन्तं च दधतो
मनो मे राधायाः पदमृदुलपद्मे निवसतु ॥ ५४ ॥ (54)

atisnehaaduchchairapi cha harinaamaani grinata
stathaa saugandhyaadyairbahubhirupachaaraishcha yajatah
paraanandam vrindaavanamanucharantam cha dadhato
mano me raadhaayaah padamridulapadme nivasatu

मैं प्रेम से ऊँचे स्वर में हरि के नाम गाऊँ, सुगंध और अनेक उपचारों से पूजन करूँ, और परमानंद में वृंदावन में विचरूँ, फिर भी मेरा मन श्रीराधा के कोमल चरण-कमलों में ही बसा रहे।

निजप्राणेश्वर्या यदपि दयनीयेयमिति मां
मुहुश्चुम्बत्यालिङ्गति सुरतमाध्व्या मदयति ।
विचित्रां स्नेहर्द्धिं रचयति तथाप्यद्भुतगते
स्तवैव श्रीराधे पदरसविलासे मम मनः ॥ ५५ ॥ (55)

nijapraaneshvaryaa yadapi dayaneeyeyamiti maam
muhushchumbatyaalingati suratamaadhvyaa madayati
vichitraam sneharddhim rachayati tathaapyadbhutagate
stavaiva shreeraadhe padarasavilaase mama manah

यह जानकर कि यह मेरी प्राणेश्वरी की कृपा-पात्र है, प्रियतम चाहे मुझ पर कितना भी स्नेह बरसाएँ, हे श्रीराधे, मेरा मन तो आपके ही चरणों के रस-विलास में रहता है।

प्रीतिं कामपि नाममात्रजनितप्रोद्दामरोमोद्गमां
राधामाधवयोः सदैव भजतोः कौमार एवोज्ज्वलाम् ।
वृन्दारण्यनवप्रसूननिचयानानीय कुञ्जान्तरे
गूढं शैशवखेलनैर्बत कदा कार्यो विवाहोत्सवः ॥ ५६ ॥ (56)

preetim kaamapi naamamaatrajanitaproddaamaromodgamaam
raadhaamaadhavayoh sadaiva bhajatoh kaumaara evojjvalaam
vrindaaranyanavaprasoonanichayaanaaneeya kunjaantare
goodham shaishavakhelanairbata kadaa kaaryo vivaahotsavah

राधा-माधव का बाल्यावस्था का ऐसा उज्ज्वल प्रेम है कि नाम सुनते ही रोमांच हो उठता है। कब मैं वृंदावन के नए फूल लाकर किसी गूढ़ कुञ्ज में खेल-खेल में उनका विवाहोत्सव रचाऊँगी?

विपञ्चितसुपञ्चमं रुचिरवेणुना गायता
प्रियेण सह वीणया मधुरगानविद्यानिधिः ।
करीन्द्रवनसम्मिलन्मदकरिण्युदारक्रमा
कदा नु वृषभानुजा मिलतु भानुजारोधसि ॥ ५७ ॥ (57)

vipanchitasupanchamam ruchiravenunaa gaayataa
priyena saha veenayaa madhuragaanavidyaanidhih
kareendravanasammilanmadakarinyudaarakramaa
kadaa nu vrishabhaanujaa milatu bhaanujaarodhasi

वे मधुर गान-विद्या की निधि हैं, प्रियतम की बंसी के साथ वीणा बजाती हैं, और गजराज से मिलने जाती हथिनी जैसी उदार गति से चलती हैं। वृषभानु-नन्दिनी मुझे यमुना-तट पर कब मिलेंगी?

सहासवरमोहनाद्भुतविलासरासोत्सवे
विचित्रवरताण्डवश्रमजलार्द्रगण्डस्थलौ ।
कदा नु वरनागरीरसिकशेखरौ तौ मुदा
भजामि पदलालनाल्ललितजीवनं कुर्वती ॥ ५८ ॥ (58)

sahaasavaramohanaadbhutavilaasaraasotsave
vichitravarataandavashramajalaardragandasthalau
kadaa nu varanaagareerasikashekharau tau mudaa
bhajaami padalaalanaallalitajeevanam kurvatee

हास्य-भरे अद्भुत रास-विलास में अनोखे नृत्य के श्रम से जिनके कपोल भीगे हैं, उस नागरी-मणि और रसिक-शेखर की चरण-सेवा से अपना जीवन सुंदर बनाती हुई मैं कब आनंद से उनका भजन करूँगी?

वृन्दारण्यनिकुञ्जमञ्जुलगृहेष्वात्मेश्वरीं मार्गयन्
हा राधे सविदग्धदर्शितपथं किं यासि नेत्यालपन् ।
कालिन्दीसलिले च तत्कुचतटीकस्तूरिकापङ्किले
स्नायं स्नायमहो कुदेहजमलं जह्यां कदा निर्मलः ॥ ५९ ॥ (59)

vrindaaranyanikunjamanjulagriheshvaatmeshvareem maargayan
haa raadhe savidagdhadarshitapatham kim yaasi netyaalapan
kaalindeesalile cha tatkuchatateekastoorikaapankile
snaayam snaayamaho kudehajamalam jahyaam kadaa nirmalah

वृंदावन के सुंदर निकुञ्जों में अपनी स्वामिनी को खोजती हुई, "हा राधे, क्या मेरे बताए मार्ग पर नहीं चलोगी?" ऐसा पुकारती हुई, उनके कस्तूरी-सुगंधित यमुना-जल में बार-बार नहाकर मैं कब निर्मल होऊँगी?

पादस्पर्शरसोत्सवं प्रणतिभिर्गोविन्दमिन्दीवर
श्यामं प्रार्थयितुं सुमञ्जुलरहःकुञ्जांश्च संमार्जितुम् ।
मालाचन्दनगन्धपूररसवत्ताम्बूलसत्पानका
न्यादातुं च रसैकदायिनि तव प्रेष्या कदा स्यामहम् ॥ ६० ॥ (60)

paadasparsharasotsavam pranatibhirgovindamindeevara
shyaamam praarthayitum sumanjularahahkunjaamshcha sammaarjitum
maalaachandanagandhapoorarasavattaamboolasatpaanakaa
nyaadaatum cha rasaikadaayini tava preshyaa kadaa syaamaham

उन श्याम गोविन्द से विनती करने को, जिनके लिए आपके चरणों का स्पर्श ही उत्सव है, एकांत कुञ्जों को बुहारने को, और माला, चंदन, सुगंध, पान व पेय लाने को, हे रस-दायिनी, मैं आपकी दासी कब बनूँगी?

लावण्यामृतवार्तया जगदिदं संप्लावयन्ती शर
द्राकाचन्द्रमनन्तमेव वदनज्योत्स्नाभिरातन्वती ।
श्रीवृन्दावनकुञ्जमञ्जुगृहिणी काप्यस्ति तुच्छामहो
कुर्वाणाखिलसाध्यसाधनकथां दत्त्वा स्वदास्योत्सवम् ॥ ६१ ॥ (61)

laavanyaamritavaartayaa jagadidam samplaavayantee shara
draakaachandramanantameva vadanajyotsnaabhiraatanvatee
shreevrindaavanakunjamanjugrihinee kaapyasti tuchchhaamaho
kurvaanaakhilasaadhyasaadhanakathaam dattvaa svadaasyotsavam

जो अपने सौंदर्य-अमृत से जगत को नहला देती हैं और मुख की चाँदनी से अनगिनत शरद-चन्द्रों का प्रकाश फैलाती हैं, वृंदावन-कुञ्ज की उन अनिर्वचनीय स्वामिनी ने अपनी सेवा का आनंद देकर सारी साधना-कथाओं को तुच्छ कर दिया।

दृष्ट्या यत्र क्वचन विहिताम्रेडने नन्दसूनोः
प्रत्याख्यानच्छलत उदितोदारसङ्केतदेशा ।
धूर्तेन्द्र त्वद्भयमुपगता सा रहो नीपवाट्यां
नैका गच्छेत्कितव कृतमित्यादिशेत्कर्हि राधा ॥ ६२ ॥ (62)

drishtyaa yatra kvachana vihitaamredane nandasoonoh
pratyaakhyaanachchhalata uditodaarasanketadeshaa
dhoortendra tvadbhayamupagataa saa raho neepavaatyaam
naikaa gachchhetkitava kritamityaadishetkarhi raadhaa

जब नंदनंदन बार-बार विनती करते हैं, तब मना करने के बहाने दृष्टि से ही मिलने का स्थान बता देती हैं, फिर कहती हैं "हे धूर्त, मैं तुमसे डरकर अकेली कदम्ब-वाटिका में नहीं जाऊँगी।" श्रीराधा मुझे साथ चलने को कब कहेंगी?

सा भ्रूनर्तनचातुरी निरुपमा सा चारुनेत्राञ्चले
लीलाखेलनचातुरी वरतनोस्तादृग्वचश्चातुरी ।
सङ्केतागमचातुरी नवनवक्रीडाकलाचातुरी
राधाया जयतात्सखीजनपरीहासोत्सवे चातुरी ॥ ६३ ॥ (63)

saa bhroonartanachaaturee nirupamaa saa chaarunetraanchale
leelaakhelanachaaturee varatanostaadrigvachashchaaturee
sanketaagamachaaturee navanavakreedaakalaachaaturee
raadhaayaa jayataatsakheejanapareehaasotsave chaaturee

उनकी भौंहों के नृत्य की अनुपम चतुरता, सुंदर नयनों की लीला की चतुरता, वचन की चतुरता, संकेत-स्थल पर आने की चतुरता, नई-नई क्रीड़ा की चतुरता, और सखियों से हास-परिहास की चतुरता, श्रीराधा की चतुरता की जय हो।

उन्मीलन्मिथुनानुरागगरिमोदारस्फुरन्माधुरी
धारासारधुरीणदिव्यललितानङ्गोत्सवैः खेलतोः ।
राधामाधवयोः परं भवतु नश्चित्ते चिरार्तिस्पृशोः
कौमारे नवकेलिशिल्पलहरीशिक्षादिदीक्षारसः ॥ ६४ ॥ (64)

unmeelanmithunaanuraagagarimodaarasphuranmaadhuree
dhaaraasaaradhureenadivyalalitaanangotsavaih khelatoh
raadhaamaadhavayoh param bhavatu nashchitte chiraartisprishoh
kaumaare navakelishilpalahareeshikshaadideekshaarasah

बचपन में ही राधा-माधव प्रेम-माधुरी से भरकर एक-दूसरे को केलि-कला सिखाते हैं। उस बाल्यावस्था की शिक्षा-दीक्षा का रस हमारे चित्त में उदित हो।

कदा वा खेलन्तौ व्रजनगरवीथीषु हृदयं
हरन्तौ श्रीराधाव्रजपतिकुमारौ सुकृतिनः ।
अकस्मात्कौमारे प्रकटनवकैशोरविभवौ
प्रपश्यन्पूर्णः स्यां रहसि परिहासादिनिरतौ ॥ ६५ ॥ (65)

kadaa vaa khelantau vrajanagaraveetheeshu hridayam
harantau shreeraadhaavrajapatikumaarau sukritinah
akasmaatkaumaare prakatanavakaishoravibhavau
prapashyanpoornah syaam rahasi parihaasaadiniratau

जो ब्रज की गलियों में खेलते हुए भाग्यवानों का हृदय चुराते हैं, और एकांत में अचानक बाल्यावस्था छोड़कर नव-किशोर वैभव प्रकट करते हुए हास-परिहास में डूब जाते हैं, उन श्रीराधा और ब्रजराज-कुमार को देखकर मैं कब पूर्ण होऊँगी?

धम्मिल्लं ते नवपरिमलैरुल्लसत्फुल्लमल्ली
मालं भालस्थलमपि लसत्सान्द्रसिन्दूरबिन्दुम् ।
दीर्घापाङ्गच्छविमनुपमां चारुचन्द्रांशुहासं
प्रेमोल्लासं तव तु कुचयोर्द्वन्द्वमन्तः स्मरामि ॥ ६६ ॥ (66)

dhammillam te navaparimalairullasatphullamallee
maalam bhaalasthalamapi lasatsaandrasindoorabindum
deerghaapaangachchhavimanupamaam chaaruchandraamshuhaasam
premollaasam tava tu kuchayordvandvamantah smaraami

मैं आपकी नई सुगंधित मल्लिका से गुँथी वेणी, माथे पर चमकती सिंदूर-बिंदी, बड़े नयनों की अनुपम छवि, चाँदनी जैसी मुसकान और आपके हृदय के प्रेमोल्लास का स्मरण करती हूँ।

लक्ष्मीकोटिविलक्ष्यलक्षणलसल्लीलाकिशोरीशतै
राराध्यं व्रजमण्डलेऽतिमधुरं राधाभिधानं परम् ।
ज्योतिः किञ्चन सिञ्चदुज्ज्वलरसप्राग्भावमाविर्भव
द्राधे चेतसि भूरिभाग्यविभवैः कस्याप्यहो जृम्भते ॥ ६७ ॥ (67)

lakshmeekotivilakshyalakshanalasalleelaakishoreeshatai
raaraadhyam vrajamandale'timadhuram raadhaabhidhaanam param
jyotih kinchana sinchadujjvalarasapraagbhaavamaavirbhava
draadhe chetasi bhooribhaagyavibhavaih kasyaapyaho jrimbhate

ब्रज में करोड़ों लक्ष्मियों से बढ़कर शोभा वाली सैकड़ों किशोरियाँ जिनकी आराधना करती हैं, उज्ज्वल रस बरसाने वाली राधा नामक वह परम मधुर ज्योति किसी बड़े भाग्यशाली के चित्त में ही प्रकट होती है।

तज्जीयान्नवयौवनोदयमहालावण्यलीलामयं
सान्द्रानन्दघनानुरागघटितश्रीमूर्तिसम्मोहनम् ।
वृन्दारण्यनिकुञ्जकेलिललितं काश्मीरगौरच्छवि
श्रीगोविन्द इव व्रजेन्द्रगृहिणीप्रेमैकपात्रं महः ॥ ६८ ॥ (68)

tajjeeyaannavayauvanodayamahaalaavanyaleelaamayam
saandraanandaghanaanuraagaghatitashreemoortisammohanam
vrindaaranyanikunjakelilalitam kaashmeeragaurachchhavi
shreegovinda iva vrajendragrihineepremaikapaatram mahah

उस ज्योति की जय हो, जो नव-यौवन के महान सौंदर्य से भरी है, घने आनंद और अनुराग से बनी मूर्ति श्रीकृष्ण को मोहित करती है, वृंदावन की केलि में ललित है, केसर-सी गौर है, और यशोदा जी को गोविन्द के समान ही प्रिय है।

प्रेमानन्दरसैकवारिधिमहाकल्लोलमालाकुला
व्यालोलारुणलोचनाञ्चलचमत्कारेण सञ्चिन्वती ।
किञ्चित्केलिकलामहोत्सवमहो वृन्दाटवीमन्दिरे
नन्दत्यद्भुतकामवैभवमयी राधा जगन्मोहिनी ॥ ६९ ॥ (69)

premaanandarasaikavaaridhimahaakallolamaalaakulaa
vyaalolaarunalochanaanchalachamatkaarena sanchinvatee
kinchitkelikalaamahotsavamaho vrindaataveemandire
nandatyadbhutakaamavaibhavamayee raadhaa jaganmohinee

प्रेमानंद-रस के महासागर की लहरों से आकुल, अपने चंचल अरुण नेत्रों के चमत्कार से केलि-उत्सव रचती हुई, जगत को मोहने वाली श्रीराधा वृंदावन के निकुञ्ज-मंदिर में आनंद करती हैं।

वृन्दारण्यनिकुञ्जसीमनि नवप्रेमानुभावभ्रम
द्भ्रूभङ्गीलवमोहितव्रजमणिर्भक्तैकचिन्तामणिः ।
सान्द्रानन्दरसामृतस्रवमणिः प्रोद्दामविद्युल्लता
कोटिज्योतिरुदेति कापि रमणीचूडामणिर्मोहिनी ॥ ७० ॥ (70)

vrindaaranyanikunjaseemani navapremaanubhaavabhrama
dbhroobhangeelavamohitavrajamanirbhaktaikachintaamanih
saandraanandarasaamritasravamanih proddaamavidyullataa
kotijyotirudeti kaapi ramaneechoodaamanirmohinee

वृंदावन के निकुञ्ज में एक मोहिनी रमणी-चूड़ामणि उदित होती हैं, जिनकी भौंहों के इशारे मात्र से ब्रज-मणि मोहित हो जाते हैं, जो भक्तों की चिन्तामणि हैं, आनंद-रस बरसाती हैं और करोड़ों बिजलियों जैसी चमकती हैं।

लीलापाङ्गतरङ्गितैरुदभवन्नेकैकशः कोटिशः
कन्दर्पाः पुरुदर्पटङ्कृतमहाकोदण्डविस्फारिणः ।
तारुण्यप्रथमप्रवेशसमये यस्या महामाधुरी
धारानन्तचमत्कृता भवतु नः श्रीराधिका स्वामिनी ॥ ७१ ॥ (71)

leelaapaangatarangitairudabhavannekaikashah kotishah
kandarpaah purudarpatankritamahaakodandavisphaarinah
taarunyaprathamapraveshasamaye yasyaa mahaamaadhuree
dhaaraanantachamatkritaa bhavatu nah shreeraadhikaa svaaminee

यौवन के पहले प्रवेश में ही जिनके एक-एक कटाक्ष से करोड़ों कामदेव धनुष ताने प्रकट हो गए, अनंत माधुर्य-धाराओं से चमत्कृत वे श्रीराधिका हमारी स्वामिनी हों।

यत्पादाम्बुरुहैकरेणुकणिकां मूर्ध्ना निधातुं न हि
प्रापुर्ब्रह्मशिवादयोऽप्यधिकृतिं गोप्यैकभावाश्रयाः ।
सापि प्रेमसुधारसाम्बुधिनिधी राधापि साधारणी
भूता कालगतिक्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः ॥ ७२ ॥ (72)

yatpaadaamburuhaikarenukanikaam moordhnaa nidhaatum na hi
praapurbrahmashivaadayo'pyadhikritim gopyaikabhaavaashrayaah
saapi premasudhaarasaambudhinidhee raadhaapi saadhaaranee
bhootaa kaalagatikramena balinaa he daiva tubhyam namah

जिनके चरण-कमल की एक रज-कण को सिर पर रखने का अधिकार ब्रह्मा, शिव आदि भी न पा सके, और गोपियाँ ही जिनका आश्रय लेती हैं, वे प्रेम-सागर की निधि श्रीराधा भी समय के साथ सुलभ हो गईं। हे दैव, तुम्हें नमस्कार।

दूरे स्निग्धपरम्परा विजयतां दूरे सुहृन्मण्डली
भृत्याः सन्तु विदूरतो व्रजपतेरन्यप्रसङ्गः कुतः ।
यत्र श्रीवृषभानुजा कृतरतिः कुञ्जोदरे कामिना
द्वारस्था प्रियकिङ्करी परमहं श्रोष्यामि काञ्चीध्वनिम् ॥ ७३ ॥ (73)

doore snigdhaparamparaa vijayataam doore suhrinmandalee
bhrityaah santu vidoorato vrajapateranyaprasangah kutah
yatra shreevrishabhaanujaa kritaratih kunjodare kaaminaa
dvaarasthaa priyakinkaree paramaham shroshyaami kaancheedhvanim

ब्रजराज के स्नेही दूर रहें, सखा उनसे दूर, सेवक और भी दूर, औरों की तो बात ही क्या। जहाँ कुञ्ज के भीतर वृषभानु-नन्दिनी प्रियतम के साथ हैं, वहाँ द्वार पर खड़ी उनकी प्रिय किंकरी मैं उनकी करधनी की ध्वनि सुनूँगी।

गौराङ्गे म्रदिमा स्मिते मधुरिमा नेत्राञ्चले द्राघिमा
वक्षोजे गरिमा तथैव तनिमा मध्ये गतौ मन्दिमा ।
श्रोण्यां च प्रथिमा भ्रुवोः कुटिलिमा बिम्बाधरे शोणिमा
श्रीराधे हृदि ते रसेन जडिमा ध्यानेऽस्तु मे गोचरः ॥ ७४ ॥ (74)

gauraange mradimaa smite madhurimaa netraanchale draaghimaa
vakshoje garimaa tathaiva tanimaa madhye gatau mandimaa
shronyaam cha prathimaa bhruvoh kutilimaa bimbaadhare shonimaa
shreeraadhe hridi te rasena jadimaa dhyaane'stu me gocharah

हे श्रीराधे! आपके गौर अंगों की कोमलता, मुसकान की मधुरता, नयनों की दीर्घता, रूप की शोभा, मंद गति, भौंहों की वक्रता, अधरों की लालिमा और प्रेम-रस से हृदय की जड़ता, यह सब मेरे ध्यान में प्रकट हो।

प्रातः पीतपटं कदा व्यपनयाम्यन्यांशुकस्यार्पणात्
कुञ्जे विस्मृतकञ्चुकीमपि समानेतुं प्रधावामि वा ।
बध्नीयां कवरीं युनज्मि गलितां मुक्तावलीमञ्जये
नेत्रे नागरि रङ्गकैश्च पिदधाम्यङ्गव्रणं वा कदा ॥ ७५ ॥ (75)

praatah peetapatam kadaa vyapanayaamyanyaamshukasyaarpanaat
kunje vismritakanchukeemapi samaanetum pradhaavaami vaa
badhneeyaam kavareem yunajmi galitaam muktaavaleemanjaye
netre naagari rangakaishcha pidadhaamyangavranam vaa kadaa

प्रातःकाल भूल से पहने पीताम्बर को बदलकर आपका वस्त्र कब पहनाऊँगी? या कुञ्ज में छूटी कंचुकी लाने दौड़ूँगी, आपकी शिथिल वेणी बाँधूँगी, टूटी मुक्तामाला पिरोऊँगी, नयनों में अंजन लगाऊँगी और अंगों की सँभाल करूँगी?

यद्वृन्दावनमात्रगोचरमहो यन्न श्रुतीकं शिरो
ऽप्यारोढुं क्षमते न यच्छिवशुकादीनां तु यद्ध्यानगम् ।
यत्प्रेमामृतमाधुरीरसमयं यन्नित्यकैशोरकं
तद्रूपं परिवेष्टुमेव नयनं लोलायमानं मम ॥ ७६ ॥ (76)

yadvrindaavanamaatragocharamaho yanna shruteekam shiro
'pyaarodhum kshamate na yachchhivashukaadeenaam tu yaddhyaanagam
yatpremaamritamaadhureerasamayam yannityakaishorakam
tadroopam pariveshtumeva nayanam lolaayamaanam mama

जो रूप केवल वृंदावन में दिखता है, जिस तक उपनिषद नहीं पहुँच पाते, जो शिव और शुक के ध्यान में भी नहीं आता, जो प्रेमामृत-माधुरी से भरा और नित्य किशोर है, उसी रूप को देखने को मेरे नेत्र चंचल हैं।

धर्माद्यर्थचतुष्टयं विजयतां किं तद्वृथावार्तया
सैकान्तेश्वरभक्तियोगपदवी त्वारोपिता मूर्धनि ।
यो वृन्दावनसीम्नि कश्चन घनाश्चर्यः किशोरीमणि
स्तत्कैङ्कर्यरसामृतादिह परं चित्ते न मे रोचते ॥ ७७ ॥ (77)

dharmaadyarthachatushtayam vijayataam kim tadvrithaavaartayaa
saikaanteshvarabhaktiyogapadavee tvaaropitaa moordhani
yo vrindaavanaseemni kashchana ghanaashcharyah kishoreemani
statkainkaryarasaamritaadiha param chitte na me rochate

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष भले ही श्रेष्ठ हों, उनकी व्यर्थ चर्चा क्यों करें। एकान्त ईश्वर-भक्ति को भी हम सिर-माथे रखते हैं। पर वृंदावन की सीमा में विराजमान उन अद्भुत किशोरी-मणि की सेवा के अमृत के सिवा मेरे मन को कुछ नहीं भाता।

प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं शृङ्गारलीलाकला
वैचित्रीपरमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता ।
ईशानी च शची महासुखतनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा
श्रीवृन्दावननाथपट्टमहिषी राधैव सेव्या मम ॥ ७८ ॥ (78)

premnah sanmadhurojjvalasya hridayam shringaaraleelaakalaa
vaichitreeparamaavadhirbhagavatah poojyaiva kaapeeshataa
eeshaanee cha shachee mahaasukhatanuh shaktih svatantraa paraa
shreevrindaavananaathapattamahishee raadhaiva sevyaa mama

जो मधुर-उज्ज्वल प्रेम की प्राण हैं, श्रृंगार-लीला की कलाओं की परम सीमा हैं, भगवान की भी पूज्य हैं, परम स्वतंत्र शक्ति हैं, वृंदावननाथ की पटरानी वे श्रीराधा ही मेरी सेव्या हैं।

राधादास्यमपास्य यः प्रयतते गोविन्दसङ्गाशया
सोऽयं पूर्णसुधारुचेः परिचयं राकां विना काङ्क्षति ।
किञ्च श्यामरतिप्रवाहलहरीबीजं न ये तां विदु
स्ते प्राप्यापि महामृताम्बुधिमहो बिन्दुं परं प्राप्नुयुः ॥ ७९ ॥ (79)

raadhaadaasyamapaasya yah prayatate govindasangaashayaa
so'yam poornasudhaarucheh parichayam raakaam vinaa kaankshati
kincha shyaamaratipravaahalahareebeejam na ye taam vidu
ste praapyaapi mahaamritaambudhimaho bindum param praapnuyuh

जो राधा की सेवा छोड़कर गोविन्द का संग चाहते हैं, वे मानो पूर्णिमा के बिना पूर्ण चन्द्र चाहते हैं। जो नहीं जानते कि श्याम के प्रेम-प्रवाह की लहरों का बीज वही हैं, वे अमृत-सागर पाकर भी केवल एक बूँद पाते हैं।

कैशोराद्भुतमाधुरीभरधुरीणाङ्गच्छविं राधिकां
प्रेमोल्लासभराधिकां निरवधि ध्यायन्ति ये तद्धियः ।
त्यक्ताः कर्मभिरात्मनैव भगवद्धर्मेऽप्यहो निर्ममाः
सर्वाश्चर्यगतिं गता रसमयीं तेभ्यो महद्भ्यो नमः ॥ ८० ॥ (80)

kaishoraadbhutamaadhureebharadhureenaangachchhavim raadhikaam
premollaasabharaadhikaam niravadhi dhyaayanti ye taddhiyah
tyaktaah karmabhiraatmanaiva bhagavaddharme'pyaho nirmamaah
sarvaashcharyagatim gataa rasamayeem tebhyo mahadbhyo namah

जो निरंतर किशोर-माधुरी और प्रेमोल्लास से भरी श्रीराधिका का ध्यान करते हैं, जिन्हें कर्मों ने स्वयं छोड़ दिया और जो भगवद्-धर्म की ममता से भी मुक्त होकर रसमयी गति पा चुके, उन महापुरुषों को नमस्कार।

लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शङ्खचक्रादिकं
विचित्रहरिमन्दिरं न रचयन्ति भालस्थले ।
लसत्तुलसिमालिकां दधति कण्ठपीठे न वा
गुरोर्भजनविक्रमात्क इह ते महाबुद्धयः ॥ ८१ ॥ (81)

likhanti bhujamoolato na khalu shankhachakraadikam
vichitraharimandiram na rachayanti bhaalasthale
lasattulasimaalikaam dadhati kanthapeethe na vaa
gurorbhajanavikramaatka iha te mahaabuddhayah

जो न भुजाओं पर शंख-चक्र अंकित करते हैं, न माथे पर तिलक रचते हैं, न गले में तुलसी की माला पहनते हैं, गुरु-भजन के बल वाले ऐसे महाबुद्धिमान यहाँ कौन हैं?

कर्माणि श्रुतिबोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा
गूढाश्चर्यरसाः स्रगादिविषयान्गृह्णन्तु मुञ्चन्तु वा ।
कैर्वा भावरहस्यपारगमतिः श्रीराधिकाप्रेयसः
किञ्चिज्ज्ञैरनुयुज्यतां बहिरहो भ्राम्यद्भिरन्यैरपि ॥ ८२ ॥ (82)

karmaani shrutibodhitaani nitaraam kurvantu kurvantu maa
goodhaashcharyarasaah sragaadivishayaangrihnantu munchantu vaa
kairvaa bhaavarahasyapaaragamatih shreeraadhikaapreyasah
kinchijjnairanuyujyataam bahiraho bhraamyadbhiranyairapi

ऐसे रसिक वेदोक्त कर्म करें या न करें, माला आदि भोग ग्रहण करें या छोड़ें, श्रीराधा-प्रियतम के भाव-रहस्य के पारगामी इन रसिकों को बाहर भटकने वाले अल्पज्ञ भला कैसे परख सकते हैं?

अलं विषयवार्तया नरककोटिबीभत्सया
वृथा श्रुतिकथाश्रमो बत बिभेमि कैवल्यतः ।
परेशभजनोन्मदा यदि शुकादयः किं ततः
परं तु मम राधिकापदरसे मनो मज्जतु ॥ ८३ ॥ (83)

alam vishayavaartayaa narakakotibeebhatsayaa
vrithaa shrutikathaashramo bata bibhemi kaivalyatah
pareshabhajanonmadaa yadi shukaadayah kim tatah
param tu mama raadhikaapadarase mano majjatu

विषयों की चर्चा बहुत हुई, वह करोड़ों नरकों जैसी है। केवल श्रुति-कथा का श्रम व्यर्थ है, और कैवल्य से तो मुझे भय लगता है। शुक आदि भगवद्-भजन में उन्मत्त हों तो हों; मेरा मन तो श्रीराधा के चरण-रस में ही डूबा रहे।

तत्सौन्दर्यं स च नववयो यौवनश्रीप्रवेशः
सा दृग्भङ्गी स च रसघनाश्चर्यवक्षोजकुम्भः ।
सोऽयं बिम्बाधरमधुरिमा तत्स्मितं सा च वाणी
सेयं लीलागतिरपि न विस्मर्यते राधिकायाः ॥ ८४ ॥ (84)

tatsaundaryam sa cha navavayo yauvanashreepraveshah
saa drigbhangee sa cha rasaghanaashcharyavakshojakumbhah
so'yam bimbaadharamadhurimaa tatsmitam saa cha vaanee
seyam leelaagatirapi na vismaryate raadhikaayaah

वह सौंदर्य, नई वय में यौवन का प्रवेश, वह कटाक्ष, बिम्ब जैसे अधरों की मधुरता, वह मुसकान, वह वाणी, और वह लीला-भरी चाल, श्रीराधिका की कोई भी बात भुलाई नहीं जाती।

यल्लक्ष्मीशुकनारदादिपरमाश्चर्यानुरागोत्सवैः
प्राप्तं त्वत्कृपयैव हि व्रजभृतां तत्तत्किशोरीगणैः ।
तत्कैङ्कर्यमनुक्षणाद्भुतरसं प्राप्तुं धृताशे मयि
श्रीराधे नवकुञ्जनागरि कृपादृष्टिं कदा दास्यसि ॥ ८५ ॥ (85)

yallakshmeeshukanaaradaadiparamaashcharyaanuraagotsavaih
praaptam tvatkripayaiva hi vrajabhritaam tattatkishoreeganaih
tatkainkaryamanukshanaadbhutarasam praaptum dhritaashe mayi
shreeraadhe navakunjanaagari kripaadrishtim kadaa daasyasi

जिस सेवा की लालसा लक्ष्मी, शुक और नारद को भी रहती है, वह ब्रज की किशोरियों ने आपकी कृपा से ही पाई। हे नव-कुञ्ज-नागरी श्रीराधे, मैं वही सेवा पाने की आशा रखती हूँ; आप मुझ पर कृपा-दृष्टि कब करेंगी?

लब्ध्वा दास्यं तदतिकृपया मोहनस्वादितेन
सौन्दर्यश्रीपदकमलयोर्लालनैः स्वापितायाः ।
श्रीराधाया मधुरमधुरोच्छिष्टपीयूषसारं
भोजं भोजं नवनवरसानन्दमग्नः कदा स्याम् ॥ ८६ ॥ (86)

labdhvaa daasyam tadatikripayaa mohanasvaaditena
saundaryashreepadakamalayorlaalanaih svaapitaayaah
shreeraadhaayaa madhuramadhurochchhishtapeeyooshasaaram
bhojam bhojam navanavarasaanandamagnah kadaa syaam

आपकी परम कृपा से वह सेवा पाकर, प्रियतम द्वारा चरण-सेवा करके सुलाई गई श्रीराधा के मधुर उच्छिष्ट प्रसाद को बार-बार पाकर, मैं कब नए-नए रसानंद में मग्न होऊँगी?

यदि स्नेहाद्राधे दिशसि रतिलाम्पट्यपदवीं
गतं ते स्वप्रेष्ठं तदपि मम निष्ठां शृणु यथा ।
कटाक्षैरालोके स्मितसहचरैर्जातपुलकं
समाश्लिष्याम्युच्चैरथ च रसये त्वत्पदरसम् ॥ ८७ ॥ (87)

yadi snehaadraadhe dishasi ratilaampatyapadaveem
gatam te svapreshtham tadapi mama nishthaam shrinu yathaa
kataakshairaaloke smitasahacharairjaatapulakam
samaashlishyaamyuchchairatha cha rasaye tvatpadarasam

हे राधे! यदि आप स्नेह से मुझे अपने प्रियतम के पास भेज दें, तब भी मेरी निष्ठा सुनिए: मेरी मुसकान-भरी चितवन से वे पुलकित होंगे, मैं उन्हें आलिंगन भी करूँगी, फिर भी मैं आपके ही चरण-रस का स्वाद लूँगी।

कृष्णः पक्षो नवकुवलयं कृष्णसारस्तमालो
नीलाम्भोदस्तव रुचिपदं नामरूपैश्च कृष्णा ।
कृष्णे कस्मात्तव विमुखता मोहनश्याममूर्ता
वित्युक्त्वा त्वां प्रहसितमुखीं किन्नु पश्यामि राधे ॥ ८८ ॥ (88)

krishnah paksho navakuvalayam krishnasaarastamaalo
neelaambhodastava ruchipadam naamaroopaishcha krishnaa
krishne kasmaattava vimukhataa mohanashyaamamoortaa
vityuktvaa tvaam prahasitamukheem kinnu pashyaami raadhe

कृष्ण-पक्ष, नया नील-कमल, कृष्णसार मृग, तमाल, नीला मेघ और कृष्णा (यमुना) सब आपको प्रिय हैं। फिर श्याम-मूर्ति श्रीकृष्ण से ही आप विमुख क्यों? हे राधे, ऐसा कहकर मैं आपका हँसता मुख कब देखूँगी?

लीलापाङ्गतरङ्गितैरिव दिशो नीलोत्पलश्यामला
दोलायत्कनकाद्रिमण्डलमिव व्योम स्तनैस्तन्वतीम् ।
उत्फुल्लस्थलपङ्कजामिव भुवं रासे पदन्यासतः
श्रीराधामनुधावतीं व्रजकिशोरीणां घटां भावये ॥ ८९ ॥ (89)

leelaapaangatarangitairiva disho neelotpalashyaamalaa
dolaayatkanakaadrimandalamiva vyoma stanaistanvateem
utphullasthalapankajaamiva bhuvam raase padanyaasatah
shreeraadhaamanudhaavateem vrajakishoreenaam ghataam bhaavaye

मैं रास में श्रीराधा का अनुसरण करती ब्रज-किशोरियों के समूह का ध्यान करती हूँ, जिनके लीलामय कटाक्ष मानो दिशाओं को नील-कमल-सा श्याम कर देते हैं और जिनके पद-न्यास से धरती खिले कमलों-सी शोभित होती है।

दृशौ त्वयि रसाम्बुधौ मधुरमीनवद्भ्राम्यतः
स्तनौ त्वयि सुधासरस्यहह चक्रवाकाविव ।
मुखं सुरतरङ्गिणि त्वयि विकासि हेमाम्बुजं
मिलन्तु मयि राधिके तव कृपातरङ्गच्छटाः ॥ ९० ॥ (90)

drishau tvayi rasaambudhau madhurameenavadbhraamyatah
stanau tvayi sudhaasarasyahaha chakravaakaaviva
mukham suratarangini tvayi vikaasi hemaambujam
milantu mayi raadhike tava kripaatarangachchhataah

आपके नयन रस-सागर में मधुर मछलियों की तरह घूमते हैं, और हे सुरतरंगिणी, आपका मुख सोने के कमल की तरह खिलता है। हे राधिके, आपकी कृपा की तरंगें मुझ तक पहुँचें।

कान्ताढ्याश्चर्यकान्ताकुलमणिकमलाकोटिकाम्यैकपादा
म्भोजभ्राजन्नखेन्दुच्छविलवविभवा काप्यगम्या किशोरी ।
उन्मर्यादप्रवृद्धप्रणयरसमहाम्भोधिगम्भीरलीला
माधुर्योज्जृम्भिताङ्गी मयि किमपि कृपारङ्गमङ्गीकरोतु ॥ ९१ ॥ (91)

kaantaadhyaashcharyakaantaakulamanikamalaakotikaamyaikapaadaa
mbhojabhraajannakhenduchchhavilavavibhavaa kaapyagamyaa kishoree
unmaryaadapravriddhapranayarasamahaambhodhigambheeraleelaa
maadhuryojjrimbhitaangee mayi kimapi kripaarangamangeekarotu

जिनके चरण-नखों की चाँदनी की एक किरण करोड़ों लक्ष्मियों का एकमात्र इच्छित वैभव है, जिनके अंग असीम प्रेम-सागर की गंभीर लीला से उल्लसित हैं, वे अगम्य किशोरी कृपा करके मुझे अपनाएँ।

कलिन्दगिरिनन्दिनीपुलिनमालतीमन्दिरे
प्रविष्टवनमालिना ललितकेलिलोलीकृते ।
प्रतिक्षणचमत्कृताद्भुतरसैकलीलानिधे
विधेहि मयि राधिके तव कृपातरङ्गच्छटाम् ॥ ९२ ॥ (92)

kalindagirinandineepulinamaalateemandire
pravishtavanamaalinaa lalitakeliloleekrite
pratikshanachamatkritaadbhutarasaikaleelaanidhe
vidhehi mayi raadhike tava kripaatarangachchhataam

यमुना-तट के मालती-मंदिर में प्रवेश करके वनमाली ने अपनी ललित केलि से जिन्हें चंचल कर दिया है, हर क्षण नए आश्चर्य की निधि, हे राधिके, मुझ पर अपनी कृपा-तरंगों की छटा फैलाइए।

यस्यास्ते बत किङ्करीषु बहुशश्चाटूनि वृन्दाटवी
कन्दर्पः कुरुते तवैव किमपि प्रेप्सुः प्रसादोत्सवम् ।
सान्द्रानन्दघनानुरागलहरीनिस्यन्दिपादाम्बुज
द्वन्द्वे श्रीवृषभानुनन्दिनि सदा वन्दे तव श्रीपदम् ॥ ९३ ॥ (93)

yasyaaste bata kinkareeshu bahushashchaatooni vrindaatavee
kandarpah kurute tavaiva kimapi prepsuh prasaadotsavam
saandraanandaghanaanuraagalahareenisyandipaadaambuja
dvandve shreevrishabhaanunandini sadaa vande tava shreepadam

वृंदावन के कामदेव स्वयं आपकी कृपा पाने को आपकी किंकरियों की बहुत चाटुकारी करते हैं। हे वृषभानु-नन्दिनी, जिनके चरण-कमलों से घने आनंद और अनुराग की लहरें बहती हैं, मैं आपके उन चरणों की सदा वंदना करती हूँ।

यज्जापः सकृदेव गोकुलपतेराकर्षकस्तत्क्षणा
द्यत्र प्रेमवतां समस्तपुरुषार्थेषु स्फुरेत्तुच्छता ।
यन्नामाङ्कितमन्त्रजापनपरः प्रीत्या स्वयं माधवः
श्रीकृष्णोऽपि तदद्भुतं स्फुरतु मे राधेति वर्णद्वयम् ॥ ९४ ॥ (94)

yajjaapah sakrideva gokulapateraakarshakastatkshanaa
dyatra premavataam samastapurushaartheshu sphurettuchchhataa
yannaamaankitamantrajaapanaparah preetyaa svayam maadhavah
shreekrishno'pi tadadbhutam sphuratu me raadheti varnadvayam

जिसका एक बार जप भी गोकुलपति को तुरंत खींच लेता है, जिससे प्रेमियों को सब पुरुषार्थ तुच्छ लगने लगते हैं, जिस नाम से अंकित मंत्र स्वयं माधव प्रेम से जपते हैं, वे अद्भुत दो अक्षर "राधा" मेरे हृदय में स्फुरित हों।

कालिन्दीतटकुञ्जमन्दिरगतो योगीन्द्रवद्यत्पद
ज्योतिर्ध्यानपरः सदा जपति यां प्रेमाश्रुपूर्णो हरिः ।
केनाप्यद्भुतमुल्लसद्रतिरसानन्देन सम्मोहिता
सा राधेति सदा स्फुरतु मे विद्या परा द्व्यक्षरा ॥ ९५ ॥ (95)

kaalindeetatakunjamandiragato yogeendravadyatpada
jyotirdhyaanaparah sadaa japati yaam premaashrupoorno harih
kenaapyadbhutamullasadratirasaanandena sammohitaa
saa raadheti sadaa sphuratu me vidyaa paraa dvyaksharaa

यमुना-तट के कुञ्ज-मंदिर में बैठकर योगियों की तरह जिनके चरणों की ज्योति का ध्यान करते हुए, प्रेमाश्रु भरे हरि सदा जिनका जप करते हैं, वह दो अक्षरों की परा विद्या "राधा" मेरे हृदय में सदा स्फुरित रहे।

देवानामथ भक्तमुक्तसुहृदामत्यन्तदूरं च यत्
प्रेमानन्दरसं महासुखकरं चोच्चारितं प्रेमतः ।
प्रेम्णाकर्णयते जपत्यथ मुदा गायत्यथालिष्वयं
जल्पत्यश्रुमुखो हरिस्तदमृतं राधेति मे जीवनम् ॥ ९६ ॥ (96)

devaanaamatha bhaktamuktasuhridaamatyantadooram cha yat
premaanandarasam mahaasukhakaram chochchaaritam prematah
premnaakarnayate japatyatha mudaa gaayatyathaalishvayam
jalpatyashrumukho haristadamritam raadheti me jeevanam

जो देवताओं, भक्तों, मुक्तों और सखाओं से भी बहुत दूर है, जो प्रेमानंद-रस है और प्रेम से बोलने पर महा सुख देता है, जिसे हरि स्वयं सुनते, जपते, सखियों में गाते और आँसू भरे मुख से बोलते हैं, वह "राधा" नामामृत मेरा जीवन है।

या वाराधयति प्रियं व्रजमणिं प्रौढानुरागोत्सवैः
संसिध्यन्ति यदाश्रयेण हि परं गोविन्दसख्युत्सुकाः ।
यत्सिद्धिः परमापदैकरसवत्याराधनात्ते नु सा
श्रीराधा श्रुतिमौलिशेखरलता नाम्नी मम प्रीयताम् ॥ ९७ ॥ (97)

yaa vaaraadhayati priyam vrajamanim praudhaanuraagotsavaih
samsidhyanti yadaashrayena hi param govindasakhyutsukaah
yatsiddhih paramaapadaikarasavatyaaraadhanaatte nu saa
shreeraadhaa shrutimaulishekharalataa naamnee mama preeyataam

जो प्रौढ़ अनुराग से अपने प्रिय ब्रज-मणि की आराधना करती हैं, गोविन्द के सख्य के इच्छुक जिनके आश्रय से परम सिद्धि पाते हैं, वेदों के मुकुट की शिखर-लता वे श्रीराधा मुझ पर प्रसन्न हों।

गात्रे कोटितडिच्छवि प्रविततानन्दच्छवि श्रीमुखे
बिम्बोष्ठे नवविद्रुमच्छवि करे सत्पल्लवैकच्छवि ।
हेमाम्भोरुहकुड्मलच्छवि कुचद्वन्द्वेऽरविन्देक्षणं
वन्दे तन्नवकुञ्जकेलिमधुरं राधाभिधानं महः ॥ ९८ ॥ (98)

gaatre kotitadichchhavi pravitataanandachchhavi shreemukhe
bimboshthe navavidrumachchhavi kare satpallavaikachchhavi
hemaambhoruhakudmalachchhavi kuchadvandve'ravindekshanam
vande tannavakunjakelimadhuram raadhaabhidhaanam mahah

जिनके अंगों में करोड़ों बिजलियों की छवि है, मुख से आनंद फैलता है, होंठ नए मूँगे से लाल हैं, हाथ नए पल्लवों जैसे हैं और नेत्र कमल जैसे हैं, नव-कुञ्ज-केलि से मधुर उस राधा नामक ज्योति की मैं वंदना करती हूँ।

मुक्तापङ्क्तिप्रतिमदशना चारुबिम्बाधरोष्ठी
मध्ये क्षामा नवनवरसावर्तगम्भीरनाभिः ।
पीनश्रोणिस्तरुणिमसमुन्मेषलावण्यसिन्धु
र्वैदग्धीनां किमपि हृदयं नागरी पातु राधा ॥ ९९ ॥ (99)

muktaapanktipratimadashanaa chaarubimbaadharoshthee
madhye kshaamaa navanavarasaavartagambheeranaabhih
peenashronistarunimasamunmeshalaavanyasindhu
rvaidagdheenaam kimapi hridayam naagaree paatu raadhaa

जिनकी दंतपंक्ति मोतियों जैसी है, अधर सुंदर बिम्ब जैसे, कटि क्षीण, नाभि नए-नए रस के भँवर जैसी गहरी, और जो नव-यौवन के लावण्य की सिन्धु हैं, चतुराई की हृदय वे नागरी श्रीराधा मेरी रक्षा करें।

स्निग्धाकुञ्चितनीलकेशि विदलद्बिम्बोष्ठि चन्द्रानने
खेलत्खञ्जनगञ्जनाक्षि रुचिमन्नासाग्रमुक्ताफले ।
पीनश्रोणि तनूदरि स्तनतटीवृत्तच्छटात्यद्भुते
राधे श्रीभुजवल्लिचारुवलये स्वं रूपमाविष्कुरु ॥ १०० ॥ (100)

snigdhaakunchitaneelakeshi vidaladbimboshthi chandraanane
khelatkhanjanaganjanaakshi ruchimannaasaagramuktaaphale
peenashroni tanoodari stanatateevrittachchhataatyadbhute
raadhe shreebhujavallichaaruvalaye svam roopamaavishkuru

हे चिकने घुँघराले नीले केशों वाली, बिम्ब जैसे अधरों और चन्द्रमुख वाली, खंजन को लजाने वाले नयनों वाली, नासिका पर मोती वाली, कृशोदरी और सुंदर कंगनों से सजी भुजाओं वाली राधे, अपना रूप मेरे सामने प्रकट कीजिए।

लज्जान्तःपटमारचय्य रचितस्मायप्रसूनाञ्जलौ
राधाङ्गे नवरङ्गधाम्नि ललितप्रस्तावने यौवने ।
श्रोणीहेमवरासने स्मरनृपेणाध्यासिते मोहने
लीलापाङ्गविचित्रताण्डवकलापाण्डित्यमुन्मीलति ॥ १०१ ॥ (101)

lajjaantahpatamaarachayya rachitasmaayaprasoonaanjalau
raadhaange navarangadhaamni lalitaprastaavane yauvane
shroneehemavaraasane smaranripenaadhyaasite mohane
leelaapaangavichitrataandavakalaapaandityamunmeelati

लज्जा का परदा डालकर, मुसकान की पुष्पांजलि से जिस नव-यौवन की ललित प्रस्तावना हुई है, उस श्रीराधा के अंग-रूपी नव-रंगमंच पर, जहाँ कामदेव स्वर्ण-सिंहासन पर विराजे हैं, लीलामय कटाक्षों की विचित्र नृत्य-कला प्रकट हो रही है।

सा लावण्यचमत्कृतिर्नववयो रूपं च तन्मोहनं
तत्तत्केलिकलाविलासलहरीचातुर्यमाश्चर्यभूः ।
नो किञ्चित्कृतमेव यत्र न नुतिर्नागो न वा सम्भ्रमो
राधामाधवयोः स कोऽपि सहजः प्रेमोत्सवः पातु वः ॥ १०२ ॥ (102)

saa laavanyachamatkritirnavavayo roopam cha tanmohanam
tattatkelikalaavilaasalahareechaaturyamaashcharyabhooh
no kinchitkritameva yatra na nutirnaago na vaa sambhramo
raadhaamaadhavayoh sa ko'pi sahajah premotsavah paatu vah

वह लावण्य का चमत्कार, वह नई वय और मोहन रूप, केलि-कला-विलास की लहरों की वह चतुराई, जहाँ न कुछ सोचकर किया गया है, न स्तुति है, न अपराध, न संकोच, राधा-माधव का वह सहज प्रेमोत्सव आपकी रक्षा करे।

येषां प्रेक्षां वितरति नवोदारगाढानुरागा
न्मेघश्यामो मधुरमधुरानन्दमूर्तिर्मुकुन्दः ।
वृन्दाटव्यां सुमहिमचमत्कारकारीण्यहो किं
तानि प्रेक्षेऽद्भुतरसनिधानानि राधापदानि ॥ १०३ ॥ (103)

yeshaam prekshaam vitarati navodaaragaadhaanuraagaa
nmeghashyaamo madhuramadhuraanandamoortirmukundah
vrindaatavyaam sumahimachamatkaarakaareenyaho kim
taani prekshe'dbhutarasanidhaanaani raadhaapadaani

जिनके दर्शन की अभिलाषा नए, उदार, गाढ़ अनुराग वाले, मधुर आनंद-मूर्ति मेघश्याम मुकुन्द भी करते हैं, वृंदावन में चमत्कार करने वाले, अद्भुत रस के भंडार वे श्रीराधा-चरण क्या मुझे कभी दिखेंगे?

बलान्नीत्वा तल्पं किमपि परिरभ्याधरसुधां
निपीय प्रोल्लिख्य प्रखरनखरेण स्तनभरम् ।
ततो नीवीं न्यस्ते रसिकमणिना त्वत्करधृते
कदा कुञ्जच्छिद्रे भवतु मम राधेऽनुनयनम् ॥ १०४ ॥ (104)

balaanneetvaa talpam kimapi parirabhyaadharasudhaam
nipeeya prollikhya prakharanakharena stanabharam
tato neeveem nyaste rasikamaninaa tvatkaradhrite
kadaa kunjachchhidre bhavatu mama raadhe'nunayanam

एकांत लीला की भाषा में, स्वामिनी के सुख में ही सुखी सखी के भाव से, कवि कुञ्ज के रंध्र से श्रीराधा और प्रियतम के अंतरंग प्रेम-विहार के दर्शन की अभिलाषा करते हैं।

करं ते पत्रालिं किमपि कुचयोः कर्तुमुचितं
पदं ते कुञ्जेषु प्रियमभिसरन्त्या अभिसृतौ ।
दृशौ कुञ्जच्छिद्रैस्तव निभृतकेलिं कलयितुं
यदा वीक्षे राधे तदपि भविता किं शुभदिनम् ॥ १०५ ॥ (105)

karam te patraalim kimapi kuchayoh kartumuchitam
padam te kunjeshu priyamabhisarantyaa abhisritau
drishau kunjachchhidraistava nibhritakelim kalayitum
yadaa veekshe raadhe tadapi bhavitaa kim shubhadinam

हे राधे! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे हाथ आपका श्रृंगार करने योग्य, मेरे पैर प्रियतम से मिलने जाती हुई आपके पीछे चलने योग्य, और मेरे नेत्र कुञ्ज के छिद्रों से आपकी एकांत केलि देखने योग्य होंगे?

रहोगोष्ठीं श्रोतुं तव निजविटेन्द्रेण ललितां
करे धृत्वा त्वां वा नवरमणतल्पे घटयितुम् ।
रतामर्दस्रस्तं कचभरमथो संयमयितुं
विदध्याः श्रीराधे मम किमधिकारोत्सवरसम् ॥ १०६ ॥ (106)

rahogoshtheem shrotum tava nijavitendrena lalitaam
kare dhritvaa tvaam vaa navaramanatalpe ghatayitum
rataamardasrastam kachabharamatho samyamayitum
vidadhyaah shreeraadhe mama kimadhikaarotsavarasam

हे श्रीराधे! क्या आप मुझे प्रियतम के साथ आपकी मधुर एकांत बातें सुनने का, हाथ पकड़कर आपको नई पुष्प-शय्या तक ले जाने का, और फिर आपके बिखरे केश सँवारने का सेवा-सुख देंगी?

वृन्दाटव्यां नवनवरसानन्दपुञ्जे निकुञ्जे
गुञ्जद्भृङ्गीकुलमुखरिते मञ्जुमञ्जुप्रहासैः ।
अन्योन्यक्षेपणनिचयनप्राप्तसङ्गोपनाद्यैः
क्रीडज्जीयाद्रसिकमिथुनं क्लृप्तकेलीकदम्बम् ॥ १०७ ॥ (107)

vrindaatavyaam navanavarasaanandapunje nikunje
gunjadbhringeekulamukharite manjumanjuprahaasaih
anyonyakshepananichayanapraaptasangopanaadyaih
kreedajjeeyaadrasikamithunam klriptakeleekadambam

वृंदावन के नित्य-नवीन रसानंद से भरे, गुंजार करते भौंरों से मुखरित निकुञ्ज में मधुर हास के साथ एक-दूसरे पर कुछ फेंकते, बटोरते और छिपाते हुए क्रीड़ा करता हुआ रसिक युगल जय पाए।

रूपं शारदचन्द्रकोटिवदने धम्मिल्लमल्लीस्रजा
मामोदैर्विकलीकृतालिपटले राधे कदा तेऽद्भुतम् ।
ग्रैवेयोज्ज्वलकम्बुकण्ठि मृदुदोर्वल्लीचलत्कङ्कणे
वीक्षे पट्टदुकूलवासिनि रणन्मञ्जीरपादाम्बुजे ॥ १०८ ॥ (108)

roopam shaaradachandrakotivadane dhammillamalleesrajaa
maamodairvikaleekritaalipatale raadhe kadaa te'dbhutam
graiveyojjvalakambukanthi mridudorvalleechalatkankane
veekshe pattadukoolavaasini rananmanjeerapaadaambuje

हे करोड़ों शरद-चन्द्रों जैसे मुख वाली, जिनकी वेणी की मल्लिका की सुगंध भौंरों को व्याकुल कर देती है, कंठ में चमकते आभूषण, कोमल भुजाओं में खनकते कंगन, रेशमी वस्त्र और बजते नूपुरों वाली राधे, आपका अद्भुत रूप मैं कब देखूँगी?

इतो भयमितस्त्रपा कुलमितो यशः श्रीरितो
हिनस्त्यखिलशृङ्खलामपि सखीनिवासस्त्वया ।
सगद्गदमुदीरितं सुबहुमोहनाकाङ्क्षया
कथं कथमयीश्वरि प्रहसितैः कदा म्रेड्यसे ॥ १०९ ॥ (109)

ito bhayamitastrapaa kulamito yashah shreerito
hinastyakhilashrinkhalaamapi sakheenivaasastvayaa
sagadgadamudeeritam subahumohanaakaankshayaa
katham kathamayeeshvari prahasitaih kadaa mredyase

"सखी-निवास (श्रीलाल जी) ने आपके लिए भय, लाज, कुल, यश और श्री, सारी बेड़ियाँ तोड़ दी हैं।" मोहन की लालसा से गद्गद होकर जब मैं यह कहूँगी, तब आप हँसकर बार-बार "क्या, क्या?" कब पूछेंगी?

श्यामे चाटुरुतानि कुर्वति सहालापान्प्रणेत्री मया
गृह्णाने च दुकूलपल्लवमहो हुङ्कृत्य मां द्रक्ष्यसि ।
बिभ्राणे भुजवल्लिमुल्लसितया रोमस्रजालङ्कृतां
दृष्ट्वा त्वां रसलीनमूर्तिमथ किं पश्यामि हास्यं ततः ॥ ११० ॥ (110)

shyaame chaaturutaani kurvati sahaalaapaanpranetree mayaa
grihnaane cha dukoolapallavamaho hunkritya maam drakshyasi
bibhraane bhujavallimullasitayaa romasrajaalankritaam
drishtvaa tvaam rasaleenamoortimatha kim pashyaami haasyam tatah

श्याम आपकी चाटुकारी कर रहे हों और आप मुझसे बात कर रही हों, फिर वे आपके आँचल को पकड़ें और आप हुंकार कर मेरी ओर देखें, जब वे आपकी भुजा पकड़ें और आप रोमांचित हो उठें, क्या मैं आपकी वह रस-लीन मूर्ति और फिर आपकी हँसी देखूँगी?

अहो रसिकशेखरः स्फुरति कोऽपि वृन्दावने
निकुञ्जनवनागरीकुचकिशोरकेलिप्रियः ।
करोतु स कृपां सखीप्रकटपूर्णनत्युत्सवो
निजप्रियतमापदे रसमये ददातु स्थितिम् ॥ १११ ॥ (111)

aho rasikashekharah sphurati ko'pi vrindaavane
nikunjanavanaagareekuchakishorakelipriyah
karotu sa kripaam sakheeprakatapoornanatyutsavo
nijapriyatamaapade rasamaye dadaatu sthitim

अहो! वृंदावन में कोई रसिक-शेखर प्रकाशित हैं, जिन्हें निकुञ्ज की नव-नागरी के साथ केलि प्रिय है और जो सखियों के सामने खुलकर विनय में ही आनंद पाते हैं। वे कृपा करें और अपनी प्रियतमा के रसमय चरणों में मुझे स्थिर स्थान दें।

विचित्रवरभूषणोज्ज्वलदुकूलसत्कञ्चुकैः
सखीभिरतिभूषिता तिलकगन्धमाल्यैरपि ।
स्वयं च सकलाकलासु कुशलीकृता नः कदा
सुरासमधुरोत्सवे किमपि वेशयेत्स्वामिनी ॥ ११२ ॥ (112)

vichitravarabhooshanojjvaladukoolasatkanchukaih
sakheebhiratibhooshitaa tilakagandhamaalyairapi
svayam cha sakalaakalaasu kushaleekritaa nah kadaa
suraasamadhurotsave kimapi veshayetsvaaminee

सखियों ने जिन्हें विचित्र आभूषणों, उज्ज्वल वस्त्रों, कंचुकी, तिलक, गंध और मालाओं से सजाया है, और जिन्होंने स्वयं हमें सब कलाओं में निपुण किया है, वे स्वामिनी हमें सुंदर रास-उत्सव में कब प्रवेश कराएँगी?

कदा सुमणिकिङ्किणीवलयनूपुरप्रोल्लसन्
महामधुरमण्डलाद्भुतविलासरासोत्सवे ।
अपि प्रणयिनो बृहद्भुजगृहीतकण्ठ्यो वयं
परं निजरसेश्वरीचरणलक्ष्म वीक्षामहे ॥ ११३ ॥ (113)

kadaa sumanikinkineevalayanoopuraprollasan
mahaamadhuramandalaadbhutavilaasaraasotsave
api pranayino brihadbhujagriheetakanthyo vayam
param nijaraseshvareecharanalakshma veekshaamahe

मणिमय किंकिणी, कंगन और नूपुरों से शोभित महा-मधुर मंडल के अद्भुत रासोत्सव में प्रियतम की बाँहों में होने पर भी, हम कब केवल अपनी रसेश्वरी के चरण-चिह्न ही देखेंगी?

यद्गोविन्दकथासुधारसह्रदे चेतो मया जृम्भितं
यद्वा तद्गुणकीर्तनार्चनविभूषाद्यैर्दिनं प्रापितम् ।
यद्यत्प्रीतिरकारि तत्प्रियजनेष्वात्यन्तिकी तेन मे
गोपेन्द्रात्मजजीवनप्रणयिनी श्रीराधिका तुष्यतु ॥ ११४ ॥ (114)

yadgovindakathaasudhaarasahrade cheto mayaa jrimbhitam
yadvaa tadgunakeertanaarchanavibhooshaadyairdinam praapitam
yadyatpreetirakaari tatpriyajaneshvaatyantikee tena me
gopendraatmajajeevanapranayinee shreeraadhikaa tushyatu

जो कुछ भी मैंने गोविन्द की कथा-सुधा में मन डुबाकर, उनके गुण-कीर्तन, पूजन और श्रृंगार में दिन बिताकर, या उनके प्रियजनों से प्रेम करके किया हो, उस सबसे गोपेन्द्र-नन्दन के प्राणों की प्रिया श्रीराधिका मुझ पर प्रसन्न हों।

रहो दास्यं तस्याः किमपि वृषभानोर्व्रजवरी
यसः पुत्र्याः पूर्णप्रणयरसमूर्तेर्यदि लभे ।
तदा नः किं धर्मैः किमु सुरगणैः किञ्च विधिना
किमीशेन श्यामप्रियमिलनयत्नैरपि च किम् ॥ ११५ ॥ (115)

raho daasyam tasyaah kimapi vrishabhaanorvrajavaree
yasah putryaah poornapranayarasamoorteryadi labhe
tadaa nah kim dharmaih kimu suraganaih kincha vidhinaa
kimeeshena shyaamapriyamilanayatnairapi cha kim

यदि ब्रज-श्रेष्ठ वृषभानु की पूर्ण-प्रेम-रस-मूर्ति पुत्री की एकांत सेवा मिल जाए, तो फिर हमें धर्म से, देवताओं से, ब्रह्मा से, शिव से, और श्याम-मिलन के प्रयासों से भी क्या प्रयोजन?

चन्द्रास्ये हरिणाक्षि देवि सुनसे शोणाधरे सुस्मिते
चिल्लक्ष्मीभुजवल्लि कम्बुरुचिरग्रीवे गिरीन्द्रस्तनि ।
भज्यन्मध्यबृहन्नितम्बकदलीखण्डोरुपादाम्बुजे
प्रोन्मीलन्नखचन्द्रमण्डलि कदा राधे मयाराध्यसे ॥ ११६ ॥ (116)

chandraasye harinaakshi devi sunase shonaadhare susmite
chillakshmeebhujavalli kamburuchiragreeve gireendrastani
bhajyanmadhyabrihannitambakadaleekhandorupaadaambuje
pronmeelannakhachandramandali kadaa raadhe mayaaraadhyase

हे चन्द्रमुखी, मृगनयनी, देवी, सुंदर नासिका, लाल अधरों और मधुर मुसकान वाली, सुंदर भुजाओं और शंख जैसी ग्रीवा वाली, क्षीण कटि और चन्द्र जैसे नखों से सजे चरण-कमलों वाली राधे, मैं आपकी आराधना कब करूँगी?

राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां
प्रीतः स्वं भजतोऽपि निर्भरमहाप्रेम्णाधिकं सर्वशः ।
आलिङ्गत्यथ चुम्बति स्ववदनात्ताम्बूलमास्येऽर्पयेत्
कण्ठे स्वां वनमालिकामपि मम न्यस्येत्कदा मोहनः ॥ ११७ ॥ (117)

raadhaapaadasarojabhaktimachalaamudveekshya nishkaitavaam
preetah svam bhajato'pi nirbharamahaapremnaadhikam sarvashah
aalingatyatha chumbati svavadanaattaamboolamaasye'rpayet
kanthe svaam vanamaalikaamapi mama nyasyetkadaa mohanah

श्रीराधा के चरण-कमलों में मेरी अचल और निष्कपट भक्ति देखकर प्रसन्न होकर मोहन महाप्रेम से मुझे गले लगाएँगे, अपने मुख का पान मुझे देंगे और अपनी वनमाला मेरे गले में पहना देंगे, ऐसा कब होगा?

लावण्यं परमाद्भुतं रतिकलाचातुर्यमत्यद्भुतं
कान्तिः कापि महाद्भुता वरतनोर्लीलागतिश्चाद्भुता ।
दृग्भङ्गी पुनरद्भुताद्भुततमा यस्याः स्मितं चाद्भुतं
सा राधाद्भुतमूर्तिरद्भुतरसं दास्यं कदा दास्यति ॥ ११८ ॥ (118)

laavanyam paramaadbhutam ratikalaachaaturyamatyadbhutam
kaantih kaapi mahaadbhutaa varatanorleelaagatishchaadbhutaa
drigbhangee punaradbhutaadbhutatamaa yasyaah smitam chaadbhutam
saa raadhaadbhutamoortiradbhutarasam daasyam kadaa daasyati

जिनका लावण्य परम अद्भुत है, प्रेम-कला की चतुराई अति अद्भुत, कांति और लीलामय चाल अद्भुत, नेत्रों की भंगिमा अद्भुतों में अद्भुत और मुसकान भी अद्भुत है, वे अद्भुत-मूर्ति श्रीराधा अपना अद्भुत रसमय दास्य मुझे कब देंगी?

भ्रमद्भ्रुकुटिसुन्दरं स्फुरितचारुबिम्बाधरं
ग्रहे मधुरहुङ्कृतं प्रणयकेलिकोपाकुलम् ।
महारसिकमौलिना सभयकौतुकं वीक्षितं
स्मरामि तव राधिके रतिकलासुखं श्रीमुखम् ॥ ११९ ॥ (119)

bhramadbhrukutisundaram sphuritachaarubimbaadharam
grahe madhurahunkritam pranayakelikopaakulam
mahaarasikamaulinaa sabhayakautukam veekshitam
smaraami tava raadhike ratikalaasukham shreemukham

हे राधिके! मैं आपके उस मुख का स्मरण करती हूँ जिसमें भौंहें नाचती हैं, सुंदर अधर फड़कते हैं, पकड़े जाने पर मधुर हुंकार निकलती है, जो प्रेम-केलि के रोष से भरा है, और जिसे रसिक-शिरोमणि भय और कौतुक से निहारते हैं।

उन्मीलन्मुकुटच्छटापरिलसद्दिक्चक्रवालं स्फुरत्
केयूराङ्गदहारकङ्कणघटानिर्धूतरत्नच्छवि ।
श्रोणीमण्डलकिङ्किणीकलरवं मञ्जीरमञ्जुध्वनिं
श्रीमत्पादसरोरुहं भज मनो राधाभिधानं महः ॥ १२० ॥ (120)

unmeelanmukutachchhataaparilasaddikchakravaalam sphurat
keyooraangadahaarakankanaghataanirdhootaratnachchhavi
shroneemandalakinkineekalaravam manjeeramanjudhvanim
shreematpaadasaroruham bhaja mano raadhaabhidhaanam mahah

हे मन! श्रीराधा नामक ज्योति का भजन कर, जिनके मुकुट की छटा से दिशाएँ जगमगाती हैं, जिनके केयूर, हार और कंगन रत्नों की शोभा को भी फीका कर देते हैं, और जिनके चरणों के नूपुर और करधनी मधुर बजती हैं।

श्यामामण्डलमौलिमण्डनमणिः श्यामानुरागस्फुर
द्रोमोद्भेदविभाविताकृतिरहो काश्मीरगौरच्छविः ।
सातीवोन्मदकामकेलितरला मां पातु मन्दस्मिता
मन्दारद्रुमकुञ्जमन्दिरगता गोविन्दपट्टेश्वरी ॥ १२१ ॥ (121)

shyaamaamandalamaulimandanamanih shyaamaanuraagasphura
dromodbhedavibhaavitaakritiraho kaashmeeragaurachchhavih
saateevonmadakaamakelitaralaa maam paatu mandasmitaa
mandaaradrumakunjamandiragataa govindapatteshvaree

जो सब नव-तरुणियों की शिरोमणि का आभूषण हैं, श्याम के अनुराग से रोमांचित हैं, केसर-सी गौर हैं, प्रेम-केलि से चंचल और मंद मुसकान वाली हैं, मंदार-कुञ्ज-मंदिर में विराजमान वे गोविन्द-पटरानी मेरी रक्षा करें।

उपास्यचरणाम्बुजे व्रजभृतां किशोरीगणै
र्महद्भिरपि पूरुषैरपरिभाव्यभावोत्सवे ।
अगाधरसधामनि स्वपदपद्मसेवाविधौ
विधेहि मधुरोज्ज्वलामिव कृतिं ममाधीश्वरि ॥ १२२ ॥ (122)

upaasyacharanaambuje vrajabhritaam kishoreeganai
rmahadbhirapi poorushairaparibhaavyabhaavotsave
agaadharasadhaamani svapadapadmasevaavidhau
vidhehi madhurojjvalaamiva kritim mamaadheeshvari

हे स्वामिनी! आपके चरण-कमल ब्रज की किशोरियों के उपास्य हैं, आपका भावोत्सव महापुरुषों की भी कल्पना से परे है। हे अगाध रस-धाम, अपने चरण-कमलों की सेवा में मेरे लिए कोई मधुर और उज्ज्वल कर्तव्य निश्चित कीजिए।

आनम्राननचन्द्रमीरितदृगापाङ्गच्छटामन्थरं
किञ्चिद्दर्शिशिरोऽवगुण्ठनपटं लीलाविलासावधिम् ।
उन्नीयालकमञ्जरीः कररुहैरालक्ष्य सन्नागर
स्याङ्गेऽङ्गं तव राधिके सचकितालोकं कदा लोकये ॥ १२३ ॥ (123)

aanamraananachandrameeritadrigaapaangachchhataamantharam
kinchiddarshishiro'vagunthanapatam leelaavilaasaavadhim
unneeyaalakamanjareeh kararuhairaalakshya sannaagara
syaange'ngam tava raadhike sachakitaalokam kadaa lokaye

हे राधिके! जब प्रियतम के अंगों से आपके अंग मिले हों और मैं अपने नखों से आपकी अलकें ऊपर उठाऊँ, तब आपका झुका हुआ मुख, धीरे-धीरे चलते कटाक्ष और थोड़ा-सा सरका घूँघट, आपकी वह चकित चितवन मैं कब देखूँगी?

राकाचन्द्रो वराको यदनुपमरसानन्दकन्दाननेन्दो
स्तत्तादृक्चन्द्रिकाया अपि किमपि कलामात्रकस्याणुतोऽपि ।
यस्याः शोणाधरश्रीविधृतनवसुधामाधुरीसारसिन्धुः
सा राधा कामबाधाविधुरमधुपतिप्राणदा प्रीयतां नः ॥ १२४ ॥ (124)

raakaachandro varaako yadanupamarasaanandakandaananendo
stattaadrikchandrikaayaa api kimapi kalaamaatrakasyaanuto'pi
yasyaah shonaadharashreevidhritanavasudhaamaadhureesaarasindhuh
saa raadhaa kaamabaadhaavidhuramadhupatipraanadaa preeyataam nah

जिनके अनुपम रसानंद वाले मुख-चन्द्र की चाँदनी के अंश के कण के सामने भी पूर्णिमा का चन्द्र बेचारा है, और जिनके लाल अधरों में नई सुधा-माधुरी का सागर है, प्रेम-व्यथा से व्याकुल मधुपति को जीवन देने वाली वे श्रीराधा हम पर प्रसन्न हों।

राकानेकविचित्रचन्द्र उदितः प्रेमामृतज्योतिषां
वीचीभिः परिपूरयेदगणितब्रह्माण्डकोटिं यदि ।
वृन्दारण्यनिकुञ्जसीमनि तदाभासः परं लक्ष्यसे
भावेनैव यदा तदैव तुलये राधे तव श्रीमुखम् ॥ १२५ ॥ (125)

raakaanekavichitrachandra uditah premaamritajyotishaam
veecheebhih paripoorayedaganitabrahmaandakotim yadi
vrindaaranyanikunjaseemani tadaabhaasah param lakshyase
bhaavenaiva yadaa tadaiva tulaye raadhe tava shreemukham

यदि अनेक विचित्र पूर्ण-चन्द्र उदय होकर प्रेमामृत की ज्योति की लहरों से अनगिनत ब्रह्मांड भर दें, और आप वृंदावन के निकुञ्ज में उनका आभास भाव से देखें, तभी, हे राधे, मैं आपके मुख की उनसे तुलना कर सकती हूँ।

कालिन्दीकूलकल्पद्रुमतलनिलयप्रोल्लसत्केलिकन्दा
वृन्दाटव्यां सदैव प्रकटतररहोवल्लवीभावभव्या ।
भक्तानां हृत्सरोजे मधुररससुधास्यन्दिपादारविन्दा
सान्द्रानन्दाकृतिर्नः स्फुरतु नवनवप्रेमलक्ष्मीरमन्दा ॥ १२६ ॥ (126)

kaalindeekoolakalpadrumatalanilayaprollasatkelikandaa
vrindaatavyaam sadaiva prakatatararahovallaveebhaavabhavyaa
bhaktaanaam hritsaroje madhurarasasudhaasyandipaadaaravindaa
saandraanandaakritirnah sphuratu navanavapremalakshmeeramandaa

जो यमुना-तट के कल्पवृक्षों के नीचे खिलती केलि का मूल हैं, वृंदावन में सदा प्रकट हैं, गोपी-भाव से सुंदर हैं, और जिनके चरण-कमल भक्तों के हृदय-कमल में मधुर रस-सुधा बरसाते हैं, वे नित्य-नवीन प्रेम-लक्ष्मी हमारे भीतर प्रकाशित हों।

शुद्धप्रेमैकलीलानिधिरहह महातङ्कमङ्कस्थितेऽपि
प्रेष्ठे बिभ्रत्यदभ्रस्फुरदतुलकृपास्नेहमाधुर्यमूर्तिः ।
प्राणालीकोटिनीराजितपदसुषमामाधुरी माधवेन
श्रीराधा मामगाधामृतरसभरिते कर्हि दास्येऽभिषिञ्चेत् ॥ १२७ ॥ (127)

shuddhapremaikaleelaanidhirahaha mahaatankamankasthite'pi
preshthe bibhratyadabhrasphuradatulakripaasnehamaadhuryamoortih
praanaaleekotineeraajitapadasushamaamaadhuree maadhavena
shreeraadhaa maamagaadhaamritarasabharite karhi daasye'bhishinchet

जो शुद्ध प्रेम-लीला की निधि हैं, प्रियतम की गोद में भी वियोग का भय रखती हैं, असीम कृपा, स्नेह और माधुर्य की मूर्ति हैं, और जिनके चरणों की शोभा की आरती माधव करोड़ों प्राणों से करते हैं, वे श्रीराधा मुझे अपने दास्य-रस से कब नहलाएँगी?

वृन्दारण्यनिकुञ्जसीमसु सदा स्वानङ्गरङ्गोत्सवै
र्माद्यत्यद्भुतमाधवाधरसुधामाध्वीकसंस्वादनैः ।
गोविन्दप्रियवर्गदुर्गमसखीवृन्दैरनालक्षिता
दास्यं दास्यति मे कदा नु कृपया वृन्दावनाधीश्वरी ॥ १२८ ॥ (128)

vrindaaranyanikunjaseemasu sadaa svaanangarangotsavai
rmaadyatyadbhutamaadhavaadharasudhaamaadhveekasamsvaadanaih
govindapriyavargadurgamasakheevrindairanaalakshitaa
daasyam daasyati me kadaa nu kripayaa vrindaavanaadheeshvaree

जो वृंदावन के निकुञ्जों में सदा प्रेम-उत्सवों और माधव के अधर-सुधा के स्वाद से मग्न रहती हैं, और गोविन्द के प्रियजनों को भी दुर्लभ हैं, वे वृंदावनाधीश्वरी कृपा करके अपना दास्य मुझे कब देंगी?

मल्लीदामनिबद्धचारुकबरं सिन्दूररेखोल्लस
त्सीमन्तं नवरत्नचित्रतिलकं गण्डोल्लसत्कुण्डलम् ।
निष्कग्रीवमुदारहारमरुणं बिभ्रद्दुकूलं नवं
विद्युत्कोटिनिभं स्मरोत्सवमयं राधाख्यमीक्षे महः ॥ १२९ ॥ (129)

malleedaamanibaddhachaarukabaram sindoorarekhollasa
tseemantam navaratnachitratilakam gandollasatkundalam
nishkagreevamudaarahaaramarunam bibhraddukoolam navam
vidyutkotinibham smarotsavamayam raadhaakhyameekshe mahah

जिनकी सुंदर वेणी मल्लिका की माला से बँधी है, माँग में सिंदूर-रेखा है, माथे पर रत्नों का तिलक, कपोलों पर कुंडल, गले में पदक और हार, और नया लाल वस्त्र है, करोड़ों बिजलियों जैसी प्रेमोत्सवमयी राधा नामक उस ज्योति का मैं दर्शन करती हूँ।

प्रेमोल्लासैकसीमा परमरसचमत्कारवैचित्र्यसीमा
सौन्दर्यस्यैकसीमा किमपि नववयोरूपलावण्यसीमा ।
लीलामाधुर्यसीमा निजजनपरमोदारवात्सल्यसीमा
सा राधा सौख्यसीमा जयति रतिकलाकेलिमाधुर्यसीमा ॥ १३० ॥ (130)

premollaasaikaseemaa paramarasachamatkaaravaichitryaseemaa
saundaryasyaikaseemaa kimapi navavayoroopalaavanyaseemaa
leelaamaadhuryaseemaa nijajanaparamodaaravaatsalyaseemaa
saa raadhaa saukhyaseemaa jayati ratikalaakelimaadhuryaseemaa

प्रेमोल्लास की सीमा, परम रस-चमत्कार की सीमा, सौंदर्य की सीमा, नई वय, रूप और लावण्य की सीमा, लीला-माधुर्य की सीमा, निजजनों के प्रति उदारता और वात्सल्य की सीमा, सुख और रति-कला-केलि-माधुर्य की सीमा, श्रीराधा की जय हो।

यस्यास्तत्सुकुमारसुन्दरपदोन्मीलन्नखेन्दुच्छटा
लावण्यैकलवोपजीवि सकलश्यामामणीमण्डलम् ।
शुद्धप्रेमविलासमूर्तिरधिकोन्मीलन्महामाधुरी
धारासारधुरीणकेलिविभवा सा राधिका मे गतिः ॥ १३१ ॥ (131)

yasyaastatsukumaarasundarapadonmeelannakhenduchchhataa
laavanyaikalavopajeevi sakalashyaamaamaneemandalam
shuddhapremavilaasamoortiradhikonmeelanmahaamaadhuree
dhaaraasaaradhureenakelivibhavaa saa raadhikaa me gatih

जिनके सुकुमार चरणों के नख-चन्द्रों की छटा के सौंदर्य का एक अंश ही सब रमणी-मणियों का जीवन है, जो शुद्ध प्रेम-विलास की मूर्ति हैं और महा-माधुरी की धारा से भरी केलि-संपदा वाली हैं, वे श्रीराधिका ही मेरी गति हैं।

कलिन्दगिरिनन्दिनीसलिलबिन्दुसन्दोहभृ
न्मृदूद्गतिरतिश्रमं मिथुनमद्भुतक्रीडया ।
अमन्दरसतुन्दिलं भ्रमरवृन्दवृन्दाटवी
निकुञ्जवरमन्दिरे किमपि सुन्दरं नन्दति ॥ १३२ ॥ (132)

kalindagirinandineesalilabindusandohabhri
nmridoodgatiratishramam mithunamadbhutakreedayaa
amandarasatundilam bhramaravrindavrindaatavee
nikunjavaramandire kimapi sundaram nandati

यमुना के जल-कणों से भीगे, अद्भुत क्रीड़ा से थोड़े थके, अमंद रस से भरे वह सुंदर युगल भौंरों से गुंजित वृंदावन के श्रेष्ठ निकुञ्ज-मंदिर में आनंद कर रहे हैं।

व्याकोशेन्दीवरविकसितामन्दहेमारविन्दं
श्रीमन्निस्यन्दनरतिरसान्दोलि कन्दर्पकेलि ।
वृन्दारण्ये नवरससुधास्यन्दिपादारविन्दं
ज्योतिर्द्वन्द्वं किमपि परमानन्दकन्दं चकास्ति ॥ १३३ ॥ (133)

vyaakoshendeevaravikasitaamandahemaaravindam
shreemannisyandanaratirasaandoli kandarpakeli
vrindaaranye navarasasudhaasyandipaadaaravindam
jyotirdvandvam kimapi paramaanandakandam chakaasti

खिले नील-कमल और पूर्ण विकसित स्वर्ण-कमल जैसी, प्रेम-रस में झूलती, वृंदावन में नए रस-अमृत बहाते चरण-कमलों वाली, परम आनंद की मूल कोई युगल-ज्योति प्रकाशित हो रही है।

ताम्बूलं क्वचदर्पयामि चरणौ संवाहयामि क्वचि
न्मालाद्यैः परिमण्डये क्वचिदहो संवीजयामि क्वचित् ।
कर्पूरादिसुवासितं क्व च पुनः सुस्वादु चाम्भोऽमृतं
पायाम्येव गृहे कदा खलु भजे श्रीराधिकामाधवौ ॥ १३४ ॥ (134)

taamboolam kvachadarpayaami charanau samvaahayaami kvachi
nmaalaadyaih parimandaye kvachidaho samveejayaami kvachit
karpooraadisuvaasitam kva cha punah susvaadu chaambho'mritam
paayaamyeva grihe kadaa khalu bhaje shreeraadhikaamaadhavau

कभी पान अर्पित करूँ, कभी चरण दबाऊँ, कभी मालाओं से सजाऊँ, कभी पंखा झलूँ, कभी कपूर से सुगंधित मीठा जल पिलाऊँ, इस प्रकार निकुञ्ज-भवन में श्रीराधा-माधव की सेवा मैं कब करूँगी?

प्रत्यङ्गोच्छलदुज्ज्वलामृतरसप्रेमैकपूर्णाम्बुधि
र्लावण्यैकसुधानिधिः पुरुकृपावात्सल्यसाराम्बुधिः ।
तारुण्यप्रथमप्रवेशविलसन्माधुर्यसाम्राज्यभू
र्गुप्तः कोऽपि महानिधिर्विजयते राधा रसैकावधिः ॥ १३५ ॥ (135)

pratyangochchhaladujjvalaamritarasapremaikapoornaambudhi
rlaavanyaikasudhaanidhih purukripaavaatsalyasaaraambudhih
taarunyaprathamapraveshavilasanmaadhuryasaamraajyabhoo
rguptah ko'pi mahaanidhirvijayate raadhaa rasaikaavadhih

जिनके अंग-अंग से उज्ज्वल प्रेमामृत छलकता है, जो लावण्य की निधि, कृपा और वात्सल्य का सागर, और यौवन के पहले प्रवेश में खिले माधुर्य-साम्राज्य की भूमि हैं, वह गुप्त महानिधि, रस की एकमात्र सीमा श्रीराधा विजयी हैं।

यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणिज्योतिरेकच्छटायाः
सान्द्रप्रेमामृतरसमहासिन्धुकोटिर्विलासः ।
सा चेद्राधा रचयति कृपादृष्टिपातं कदाचि
न्मुक्तिस्तुच्छी भवति बहुशः प्राकृताप्राकृतश्रीः ॥ १३६ ॥ (136)

yasyaah sphoorjatpadanakhamanijyotirekachchhataayaah
saandrapremaamritarasamahaasindhukotirvilaasah
saa chedraadhaa rachayati kripaadrishtipaatam kadaachi
nmuktistuchchhee bhavati bahushah praakritaapraakritashreeh

जिनके चरण-नख-मणियों की एक किरण का विलास प्रेमामृत के करोड़ों सागरों जैसा है, वे श्रीराधा यदि कभी कृपा-दृष्टि कर दें, तो मुक्ति और सब लौकिक-अलौकिक शोभाएँ तुच्छ हो जाएँ।

कदा वृन्दारण्ये मधुरमधुरानन्दरसदे
प्रियेश्वर्याः केलीभवननवकुञ्जानि मृगये ।
कदा श्रीराधायाः पदकमलमाध्वीकलहरी
परीवाहैश्चेतो मधुकरमधीरं मदयिता ॥ १३७ ॥ (137)

kadaa vrindaaranye madhuramadhuraanandarasade
priyeshvaryaah keleebhavananavakunjaani mrigaye
kadaa shreeraadhaayaah padakamalamaadhveekalaharee
pareevaahaishcheto madhukaramadheeram madayitaa

मधुर से मधुर आनंद देने वाले वृंदावन में अपनी प्रियेश्वरी के केलि-भवन के नए कुञ्जों को मैं कब खोजूँगी? और श्रीराधा-चरण-कमल के मकरंद की धारा से मेरा मन-भौंरा कब अधीर और मतवाला होगा?

राधाकेलिनिकुञ्जवीथिषु चरन्राधाभिधामुच्चर
न्राधाया अनुरूपमेव परमं धर्मं रसेनाचरन् ।
राधायाश्चरणाम्बुजं परिचरन्नानोपचारैर्मुदा
कर्हि स्यां श्रुतिशेखरोपरि चरन्नाश्चर्यचर्यां चरन् ॥ १३८ ॥ (138)

raadhaakelinikunjaveethishu charanraadhaabhidhaamuchchara
nraadhaayaa anuroopameva paramam dharmam rasenaacharan
raadhaayaashcharanaambujam paricharannaanopachaarairmudaa
karhi syaam shrutishekharopari charannaashcharyacharyaam charan

श्रीराधा के केलि-निकुञ्ज की गलियों में विचरती, राधा-नाम पुकारती, उनके अनुरूप अपने परम धर्म का रस से पालन करती, और प्रसन्नता से अनेक उपचारों से उनके चरणों की सेवा करती हुई मैं वेदों से भी परे की यह अद्भुत चर्या कब करूँगी?

यातायातशतेन सङ्गमितयोरन्योन्यवक्त्रोल्लस
च्चन्द्रालोकनसम्प्रभूतबहुलानङ्गाम्बुधिक्षोभयोः ।
अन्तःकुञ्जकुटीरतल्पगतयोर्दिव्याद्भुतक्रीडयो
राधामाधवयोः कदा नु शृणुयां मञ्जीरकाञ्चीध्वनिम् ॥ १३९ ॥ (139)

yaataayaatashatena sangamitayoranyonyavaktrollasa
chchandraalokanasamprabhootabahulaanangaambudhikshobhayoh
antahkunjakuteeratalpagatayordivyaadbhutakreedayo
raadhaamaadhavayoh kadaa nu shrinuyaam manjeerakaancheedhvanim

सैकड़ों बार आने-जाने के बाद मिले, एक-दूसरे के मुख-चन्द्र को देखकर जिनमें प्रेम का सागर उमड़ पड़ा है, कुञ्ज-कुटीर की शय्या पर दिव्य क्रीड़ा में रत राधा-माधव के नूपुर और करधनी की ध्वनि मैं कब सुनूँगी?

अहो भुवनमोहनं मधुरमाधवीमण्डपे
मधूत्सवसमुत्सुकं किमपि नीलपीतच्छवि ।
विदग्धमिथुनं मिथो दृढतरानुरागोल्लस
न्मदं मदयते कदा चिरतरं मदीयं मनः ॥ १४० ॥ (140)

aho bhuvanamohanam madhuramaadhaveemandape
madhootsavasamutsukam kimapi neelapeetachchhavi
vidagdhamithunam mitho dridhataraanuraagollasa
nmadam madayate kadaa chirataram madeeyam manah

अहो! मधुर माधवी-मंडप में वसंतोत्सव के लिए उत्सुक, नील-पीत छवि वाला, जगत को मोहने वाला, परस्पर दृढ़ अनुराग से उन्मत्त वह विदग्ध युगल मेरे मन को सदा के लिए कब मतवाला करेगा?

राधानामसुधारसं रसयितुं जिह्वास्तु मे विह्वला
पादौ तत्पदकाङ्कितासु चरतां वृन्दाटवीवीथिषु ।
तत्कर्मैव करः करोतु हृदयं तस्याः पदं ध्यायता
त्तद्भावोत्सवतः परं भवतु मे तत्प्राणनाथे रतिः ॥ १४१ ॥ (141)

raadhaanaamasudhaarasam rasayitum jihvaastu me vihvalaa
paadau tatpadakaankitaasu charataam vrindaataveeveethishu
tatkarmaiva karah karotu hridayam tasyaah padam dhyaayataa
ttadbhaavotsavatah param bhavatu me tatpraananaathe ratih

मेरी जीभ राधा-नाम के अमृत को चखने को व्याकुल रहे, पैर उनके चरण-चिह्नों वाली वृंदावन की गलियों में चलें, हाथ उन्हीं का काम करें, हृदय उन्हीं के चरणों का ध्यान करे, और उनके भाव से ही उनके प्राणनाथ में मेरा प्रेम हो।

मन्दीकृत्य मुकुन्दसुन्दरपदद्वन्द्वारविन्दामल
प्रेमानन्दममन्दमिन्दुतिलकाद्युन्मादकन्दं परम् ।
राधाकेलिकथारसाम्बुधिचलद्वीचीभिरान्दोलितं
वृन्दारण्यनिकुञ्जमन्दिरवरालिन्दे मनो नन्दतु ॥ १४२ ॥ (142)

mandeekritya mukundasundarapadadvandvaaravindaamala
premaanandamamandamindutilakaadyunmaadakandam param
raadhaakelikathaarasaambudhichaladveecheebhiraandolitam
vrindaaranyanikunjamandiravaraalinde mano nandatu

मुकुन्द के सुंदर चरण-कमलों का वह निर्मल प्रेमानंद भी, जो शिव आदि को उन्मत्त करता है, उसे भी पीछे छोड़कर मेरा मन श्रीराधा-केलि-कथा के सागर की लहरों में झूलता हुआ वृंदावन के निकुञ्ज-मंदिर के आँगन में आनंद करे।

राधानामैव कार्यं ह्यनुदिनमिलितं साधनाधीशकोटि
स्त्याज्यो नीराज्य राधापदकमलसुधां सत्पुमर्थाग्रकोटिः ।
राधापादाब्जलीलाभुवि जयति सदामन्दमन्दारकोटिः
श्रीराधाकिङ्करीणां लुठति चरणयोरद्भुता सिद्धिकोटिः ॥ १४३ ॥ (143)

raadhaanaamaiva kaaryam hyanudinamilitam saadhanaadheeshakoti
styaajyo neeraajya raadhaapadakamalasudhaam satpumarthaagrakotih
raadhaapaadaabjaleelaabhuvi jayati sadaamandamandaarakotih
shreeraadhaakinkareenaam luthati charanayoradbhutaa siddhikotih

प्रतिदिन केवल राधा-नाम ही करने योग्य है; उसके आगे करोड़ों श्रेष्ठ साधन छोड़े जा सकते हैं और राधा-चरण-सुधा पर सब पुरुषार्थ न्योछावर हैं। राधा-चरणों की लीला-भूमि में करोड़ों कल्पवृक्ष सदा शोभित हैं, और श्रीराधा की किंकरियों के चरणों में करोड़ों सिद्धियाँ लोटती हैं।

मिथोभङ्गीकोटिप्रवहदनुरागामृतरसो
त्तरङ्गभ्रूभङ्गक्षुभितबहिरभ्यन्तरमहो ।
मदाघूर्णन्नेत्रं रचयति विचित्रं रतिकला
विलासं तत्कुञ्जे जयति नवकैशोरमिथुनम् ॥ १४४ ॥ (144)

mithobhangeekotipravahadanuraagaamritaraso
ttarangabhroobhangakshubhitabahirabhyantaramaho
madaaghoornannetram rachayati vichitram ratikalaa
vilaasam tatkunje jayati navakaishoramithunam

परस्पर करोड़ों भंगिमाओं से जिनमें अनुरागामृत बहता है, भौंहों की तरंगें जिन्हें भीतर-बाहर आंदोलित कर देती हैं, और मद से घूमते नेत्रों से जो विचित्र प्रेम-विलास रचते हैं, उस कुञ्ज के नव-किशोर युगल की जय हो।

काचिद्वृन्दावननवलतामन्दिरे नन्दसूनो
र्दृप्यद्दोष्कन्दलदृढपरीरम्भनिस्पन्दगात्री ।
दिव्यानन्ताद्भुतरसकलाः कल्पयन्त्याविरास्ते
सान्द्रानन्दामृतरसघनप्रेममूर्तिः किशोरी ॥ १४५ ॥ (145)

kaachidvrindaavananavalataamandire nandasoono
rdripyaddoshkandaladridhapareerambhanispandagaatree
divyaanantaadbhutarasakalaah kalpayantyaaviraaste
saandraanandaamritarasaghanapremamoortih kishoree

वृंदावन के नव-लता-मंदिर में नंदनंदन की दृढ़ बाँहों के आलिंगन से जिनके अंग स्थिर हो गए हैं, और जो दिव्य, अनंत, अद्भुत रस-कलाएँ रचती हैं, घने आनंदामृत और प्रेम की मूर्ति वे किशोरी विराजमान हैं।

न जानीते लोकं न च निगमजातं कुलपर
म्परां वा नो जानात्यहह न सतां चापि चरितम् ।
रसं राधायामाभजति किल भावं व्रजमणौ
रहस्ये तद्यस्य स्थितिरपि न साधारणगतिः ॥ १४६ ॥ (146)

na jaaneete lokam na cha nigamajaatam kulapara
mparaam vaa no jaanaatyahaha na sataam chaapi charitam
rasam raadhaayaamaabhajati kila bhaavam vrajamanau
rahasye tadyasya sthitirapi na saadhaaranagatih

ऐसे रसिक न लोक को जानते हैं, न वेदों को, न कुल-परंपरा को, न संतों के आचरण को ही। जो एकांत में श्रीराधा के रस और ब्रज-मणि के भाव का भजन करते हैं, उनकी स्थिति साधारण नहीं है।

ब्रह्मानन्दैकवादाः कतिचन भगवद्वन्दनानन्दमत्ताः
केचिद्गोविन्दसख्याद्यनुपमपरमानन्दमन्ये स्वदन्ते ।
श्रीराधाकिङ्करीणां त्वखिलसुखचमत्कारसारैकसीमा
तत्पादाम्भोजराजन्नखमणिविलसज्ज्योतिरेकच्छटापि ॥ १४७ ॥ (147)

brahmaanandaikavaadaah katichana bhagavadvandanaanandamattaah
kechidgovindasakhyaadyanupamaparamaanandamanye svadante
shreeraadhaakinkareenaam tvakhilasukhachamatkaarasaaraikaseemaa
tatpaadaambhojaraajannakhamanivilasajjyotirekachchhataapi

कुछ लोग केवल ब्रह्मानंद की बात करते हैं, कुछ भगवद्-वंदना के आनंद में मस्त हैं, कुछ गोविन्द के सख्य को परमानंद मानते हैं; पर श्रीराधा की किंकरियों के लिए उनके चरण-नखों की एक किरण ही सब सुखों की सीमा है।

न देवैर्ब्रह्माद्यैर्न खलु हरिभक्तैर्न सुहृदा
दिभिर्यद्वै राधामधुपतिरहस्यं सुविदितम् ।
तयोर्दासीभूत्वा तदुपचितकेलीरसमये
दुरन्ताः प्रत्याशा हरि हरि दृशोर्गोचरयितुम् ॥ १४८ ॥ (148)

na devairbrahmaadyairna khalu haribhaktairna suhridaa
dibhiryadvai raadhaamadhupatirahasyam suviditam
tayordaaseebhootvaa tadupachitakeleerasamaye
durantaah pratyaashaa hari hari drishorgocharayitum

श्रीराधा-मधुपति का रहस्य न ब्रह्मा आदि देवताओं को ठीक से ज्ञात है, न हरि-भक्तों को, न सखाओं को। हरि हरि! उनकी दासी बनकर उनकी केलि को अपनी आँखों से देखने की कठिन आशा मैंने लगा रखी है।

त्वयि श्यामे नित्ये प्रणयिनि विदग्धे रसनिधौ
प्रिये भूयो भूयः सुदृढमतिरागो भवतु मे ।
इति प्रेष्ठेनोक्ता रमण मम चित्ते तव वचो
वदन्तीति स्मेरा मम मनसि राधा विलसतु ॥ १४९ ॥ (149)

tvayi shyaame nitye pranayini vidagdhe rasanidhau
priye bhooyo bhooyah sudridhamatiraago bhavatu me
iti preshthenoktaa ramana mama chitte tava vacho
vadanteeti smeraa mama manasi raadhaa vilasatu

प्रियतम कहते हैं, "हे श्यामे, नित्य प्रणयिनी, विदग्धे, रसनिधि, प्रिये, आपमें मेरा अनुराग बार-बार दृढ़ होता रहे।" और वे मुसकाकर कहती हैं, "हे रमण, मेरे हृदय में भी यही वचन हैं।" वे श्रीराधा मेरे मन में सदा विलास करें।

सदानन्दं वृन्दावननवलतामन्दिरवरे
ष्वमन्दैः कन्दर्पोन्मदरतिकलाकौतुकरसम् ।
किशोरं तज्ज्योतिर्युगलमतिघोरं मम भवं
ज्वलज्ज्वालं शीतैः स्वपदमकरन्दैः शमयतु ॥ १५० ॥ (150)

sadaanandam vrindaavananavalataamandiravare
shvamandaih kandarponmadaratikalaakautukarasam
kishoram tajjyotiryugalamatighoram mama bhavam
jvalajjvaalam sheetaih svapadamakarandaih shamayatu

वृंदावन के सुंदर लता-मंदिरों में सदा आनंदमय और प्रेम-केलि के कौतुक-रस से भरी वह किशोर युगल-ज्योति अपने चरणों के शीतल मकरंद से मेरे अति घोर, जलते हुए संसार-ताप को शांत करे।

उन्मीलन्नवमल्लिदामविलसद्धम्मिल्लभारे बृह
च्छ्रोणीमण्डलमेखलाकलरवे शिञ्जानमञ्जीरिणि ।
केयूराङ्गदकङ्कणावलिलसद्दोर्वल्लिदीप्तिच्छटे
हेमाम्भोरुहकुड्मलस्तनि कदा राधे दृशा पीयसे ॥ १५१ ॥ (151)

unmeelannavamallidaamavilasaddhammillabhaare briha
chchhroneemandalamekhalaakalarave shinjaanamanjeerini
keyooraangadakankanaavalilasaddorvallideeptichchhate
hemaambhoruhakudmalastani kadaa raadhe drishaa peeyase

हे खिली मल्लिका से सजी वेणी वाली, कमर पर बजती करधनी और झनकते नूपुरों वाली, केयूर और कंगनों से चमकती भुजाओं वाली, सुनहरे कमल की कली जैसी राधे, मेरे नेत्र आपकी इस छवि का पान कब करेंगे?

अमर्यादोन्मीलत्सुरतरसपीयूषजलधेः
सुधाङ्गैरुत्तुङ्गैरिव किमपि दोलायिततनुः ।
स्फुरन्ती प्रेयोऽङ्के स्फुटकनकपङ्केरुहमुखी
सखीनां नो राधे नयनसुखमाधास्यसि कदा ॥ १५२ ॥ (152)

amaryaadonmeelatsuratarasapeeyooshajaladheh
sudhaangairuttungairiva kimapi dolaayitatanuh
sphurantee preyo'nke sphutakanakapankeruhamukhee
sakheenaam no raadhe nayanasukhamaadhaasyasi kadaa

प्रेम-सुधा-सागर की ऊँची लहरों पर मानो झूलती हुई, स्वर्ण-कमल जैसे मुख वाली, प्रियतम के अंक में शोभित, हे राधे, हम सखियों के नेत्रों को सुख आप कब देंगी?

क्षरन्तीव प्रत्यक्षरमनुपमप्रेमजलधिं
सुधाधारावृष्टीरिव विदधती श्रोत्रपुटयोः ।
रसार्द्रा सन्मृद्वी परमसुखदा शीतलतरा
भवित्री किं राधे तव सह मया कापि सुकथा ॥ १५३ ॥ (153)

ksharanteeva pratyaksharamanupamapremajaladhim
sudhaadhaaraavrishteeriva vidadhatee shrotraputayoh
rasaardraa sanmridvee paramasukhadaa sheetalataraa
bhavitree kim raadhe tava saha mayaa kaapi sukathaa

जिसके हर अक्षर से अनुपम प्रेम-सागर झरता हो, जो कानों में अमृत की धारा बरसाए, जो रस से भीगी, कोमल, परम सुखद और शीतल हो, हे राधे, क्या आपसे मेरी कभी ऐसी मधुर बातचीत होगी?

अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति
र्महाप्रेमाविष्टस्तव परमदेयं विमृशति ।
तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृतरसं
महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैकमनसाम् ॥ १५४ ॥ (154)

anullikhyaanantaanapi sadaparaadhaanmadhupati
rmahaapremaavishtastava paramadeyam vimrishati
tavaikam shreeraadhe grinata iha naamaamritarasam
mahimnah kah seemaam sprishati tava daasyaikamanasaam

हे श्रीराधे! जो आपका एक अमृत-नाम गाता है, उसके अनगिनत बड़े अपराधों को भी महाप्रेम में डूबे मधुपति अनदेखा कर देते हैं और सोचते हैं कि उसे क्या दें। जिनका मन केवल आपकी सेवा में है, उनकी महिमा की सीमा कौन छू सकता है?

लुलितनवलवङ्गोदारकर्पूरपूरं
प्रियतममुखचन्द्रोद्गीर्णताम्बूलखण्डम् ।
घनपुलककपोला स्वादयन्ती मदास्ये
ऽर्पयतु किमपि दासीवत्सला कर्हि राधा ॥ १५५ ॥ (155)

lulitanavalavangodaarakarpoorapooram
priyatamamukhachandrodgeernataamboolakhandam
ghanapulakakapolaa svaadayantee madaasye
'rpayatu kimapi daaseevatsalaa karhi raadhaa

प्रियतम के मुख से प्राप्त, लौंग और कपूर से भरे पान का स्वाद लेती हुई, आनंद से पुलकित कपोलों वाली, दासियों पर स्नेह रखने वाली श्रीराधा उसमें से कुछ मुझे कब देंगी?

सौन्दर्यामृतराशिरद्भुतमहालावण्यलीलाकला
कालिन्दीवरवीचिडम्बरपरिस्फूर्जत्कटाक्षच्छविः ।
सा कापि स्मरकेलिकोमलकलावैचित्र्यकोटिस्फुर
त्प्रेमानन्दघनाकृतिर्दिशतु मे दास्यं किशोरीमणिः ॥ १५६ ॥ (156)

saundaryaamritaraashiradbhutamahaalaavanyaleelaakalaa
kaalindeevaraveechidambaraparisphoorjatkataakshachchhavih
saa kaapi smarakelikomalakalaavaichitryakotisphura
tpremaanandaghanaakritirdishatu me daasyam kishoreemanih

सौंदर्य-अमृत की राशि, अद्भुत लावण्य-लीला की कला वाली, यमुना की लहरों जैसे चमकते कटाक्षों वाली, प्रेमानंद की घनी मूर्ति वे किशोरी-मणि मुझे अपनी सेवा दें।

दुकूलमतिकोमलं कलयदेव कौसुम्भकं
निबद्धमधुमल्लिकाललितमाल्यधम्मिल्लकम् ।
बृहत्कटितटस्फुरन्मुखरमेखलालङ्कृतं
कदा नु कलयामि तत्कनकचम्पकाभं महः ॥ १५७ ॥ (157)

dukoolamatikomalam kalayadeva kausumbhakam
nibaddhamadhumallikaalalitamaalyadhammillakam
brihatkatitatasphuranmukharamekhalaalankritam
kadaa nu kalayaami tatkanakachampakaabham mahah

जिन्होंने अति कोमल कसूँबी रंग का वस्त्र पहना है, जिनकी वेणी वसंती मल्लिका की मालाओं से बँधी है, और कमर पर करधनी बज रही है, उस सुनहरे चम्पा जैसी ज्योति को मैं कब देखूँगी?

कदा रासे प्रेमोन्मदरसविलासेऽद्भुतमये
दिशोर्मध्ये भ्राजन्मधुपतिसखीवृन्दवलये ।
मुदान्तः कान्तेन स्वरचितमहालास्यकलया
निषेवे नृत्यन्तीं व्यजननवताम्बूलशकलैः ॥ १५८ ॥ (158)

kadaa raase premonmadarasavilaase'dbhutamaye
dishormadhye bhraajanmadhupatisakheevrindavalaye
mudaantah kaantena svarachitamahaalaasyakalayaa
nisheve nrityanteem vyajananavataamboolashakalaih

प्रेमोन्मत्त रस-विलास से भरे अद्भुत रास में, जहाँ सखियाँ श्रीकृष्ण को कंगन की तरह घेरे हैं, वे प्रियतम के साथ अपनी रची नृत्य-कला से नाचती हैं। मैं वहाँ पंखे और नए पान से उनकी सेवा कब करूँगी?

प्रसृमरपटवासे प्रेमसीमाविकाशे
मधुरमधुरहासे दिव्यभूषाविलासे ।
पुलकितदयितांसे संवलद्बाहुपाशे
तदतिललितरासे कर्हि राधामुपासे ॥ १५९ ॥ (159)

prasrimarapatavaase premaseemaavikaashe
madhuramadhurahaase divyabhooshaavilaase
pulakitadayitaamse samvaladbaahupaashe
tadatilalitaraase karhi raadhaamupaase

फैलती सुगंध, खिलते प्रेम, मधुर हँसी और दिव्य आभूषणों वाले उस अति ललित रास में, जहाँ वे पुलकित प्रियतम के कंधे पर भुजा रखे हैं, मैं श्रीराधा की उपासना कब करूँगी?

यदि कनकसरोजं कोटिचन्द्रांशुपूर्णं
नवनवमकरन्दस्यन्दि सौन्दर्यधाम ।
भवति लसितचञ्चत्खञ्जनद्वन्द्वमास्यं
तदपि मधुरहास्यं दत्तदास्यं न तस्याः ॥ १६० ॥ (160)

yadi kanakasarojam kotichandraamshupoornam
navanavamakarandasyandi saundaryadhaama
bhavati lasitachanchatkhanjanadvandvamaasyam
tadapi madhurahaasyam dattadaasyam na tasyaah

यदि कोई सुनहरा कमल करोड़ों चन्द्रमाओं की किरणों से भरा हो, उससे नित्य नया मकरंद झरता हो, और उसमें दो खंजन नाच रहे हों, तब भी वह उनके मुख की मधुर मुसकान की बराबरी नहीं कर सकता।

सुधाकरमुधाकरं प्रतिपदस्फुरन्माधुरी
धुरीणनवचन्द्रिकाजलधितुन्दिलं राधिके ।
अतृप्तहरिलोचनद्वयचकोरपेयं कदा
रसाम्बुधिसमुन्नतं वदनचन्द्रमीक्षे तव ॥ १६१ ॥ (161)

sudhaakaramudhaakaram pratipadasphuranmaadhuree
dhureenanavachandrikaajaladhitundilam raadhike
atriptaharilochanadvayachakorapeyam kadaa
rasaambudhisamunnatam vadanachandrameekshe tava

हे राधिके! आपका मुख चन्द्रमा को भी फीका कर देता है, हर पल माधुर्य से भरा है, और हरि के कभी न तृप्त होने वाले नेत्र-चकोरों का पेय है। आपके उस मुख-चन्द्र को मैं कब देखूँगी?

अङ्गप्रत्यङ्गरिङ्गन्मधुरतरमहाकीर्तिपीयूषसिन्धो
रिन्दोः कोटिर्विनिन्दद्वदनमतिमदालोलनेत्रं दधत्याः ।
राधायाः सौकुमार्याद्भुतललिततनोः केलिकल्लोलिनीना
मानन्दस्यन्दिनीनां प्रणयरसमयान्किं विगाहे प्रवाहान् ॥ १६२ ॥ (162)

angapratyangaringanmadhurataramahaakeertipeeyooshasindho
rindoh kotirvinindadvadanamatimadaalolanetram dadhatyaah
raadhaayaah saukumaaryaadbhutalalitatanoh kelikallolineenaa
maanandasyandineenaam pranayarasamayaankim vigaahe pravaahaan

जिनके अंग-अंग से मधुर कीर्ति का अमृत-सागर बहता है, जिनका मुख करोड़ों चन्द्रों को लजाता है और नेत्र आनंद से चंचल हैं, क्या मैं कभी श्रीराधा की उन प्रेम-भरी केलि-धाराओं में स्नान करूँगी?

मत्कण्ठे किं नखरशिखया दैत्यराजोऽस्मि नाहं
मैवं पीडां कुरु कुचतटे पूतना नाहमस्मि ।
इत्थं कीरैरनुकृतवचः प्रेयसा सङ्गतायाः
प्रातः श्रोष्ये तव सखि कदा केलिकुञ्जे मृजन्ती ॥ १६३ ॥ (163)

matkanthe kim nakharashikhayaa daityaraajo'smi naaham
maivam peedaam kuru kuchatate pootanaa naahamasmi
ittham keerairanukritavachah preyasaa sangataayaah
praatah shroshye tava sakhi kadaa kelikunje mrijantee

प्रातःकाल केलि-कुञ्ज बुहारते हुए, हे सखी, मैं कब तोतों को आपके वे विनोद-भरे वचन दोहराते सुनूँगी जो आपने प्रियतम से श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की याद दिलाकर कहे थे?

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुरतु मे राधापदाब्जच्छटा
वैकुण्ठे नरकेऽथवा मम गतिर्नान्यास्तु राधां विना ।
राधाकेलिकथासुधाम्बुधिमहावीचीभिरान्दोलितं
कालिन्दीतटकुञ्जमन्दिरवरालिन्दे मनो विन्दतु ॥ १६४ ॥ (164)

jaagratsvapnasushuptishu sphuratu me raadhaapadaabjachchhataa
vaikunthe narake'thavaa mama gatirnaanyaastu raadhaam vinaa
raadhaakelikathaasudhaambudhimahaaveecheebhiraandolitam
kaalindeetatakunjamandiravaraalinde mano vindatu

जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में मेरे भीतर श्रीराधा-चरण-कमल की छटा प्रकाशित रहे। वैकुण्ठ हो या नरक, राधा के सिवा मेरी कोई गति न हो, और राधा-केलि-कथा की लहरों में झूलता मेरा मन यमुना-तट के कुञ्ज-मंदिर में आनंद पाए।

अलिन्दे कालिन्दीतटनवलतामन्दिरवरे
रतामर्दोद्भूतश्रमजलभरापूर्णवपुषोः ।
सुखस्पर्शेनामीलितनयनयोः शीतमतुलं
कदा कुर्यां संवीजनमहह राधामुरभिदोः ॥ १६५ ॥ (165)

alinde kaalindeetatanavalataamandiravare
rataamardodbhootashramajalabharaapoornavapushoh
sukhasparshenaameelitanayanayoh sheetamatulam
kadaa kuryaam samveejanamahaha raadhaamurabhidoh

यमुना-तट के श्रेष्ठ लता-मंदिर के आँगन में जब युगल किशोर थके हुए और सुख से नेत्र मूँदे विश्राम करें, तब मैं उन्हें पंखा झलकर ठंडक कब पहुँचाऊँगी?

क्षणं मधुरगानतः क्षणममन्दहिन्दोलतः
क्षणं कुसुमवायुतः सुरतकेलिशिल्पैः क्षणम् ।
अहो मधुरसद्रसप्रणयकेलिवृन्दावने
विदग्धवरनागरीरसिकशेखरौ खेलतः ॥ १६६ ॥ (166)

kshanam madhuragaanatah kshanamamandahindolatah
kshanam kusumavaayutah suratakelishilpaih kshanam
aho madhurasadrasapranayakelivrindaavane
vidagdhavaranaagareerasikashekharau khelatah

कभी मधुर गान से, कभी झूले पर, कभी फूलों की सुगंधित हवा में, कभी केलि-कला में, मधुर प्रेम-केलि के वृंदावन में वह चतुर नागरी और रसिक-शेखर क्रीड़ा करते हैं।

अद्य श्यामकिशोरमौलिरहह प्राप्तो रजन्या मुखे
नीत्वा तां करयोः प्रगृह्य सहसा नीपाटवीं प्राविशत् ।
श्रोष्ये तल्पमिलन्महारतिभरे प्राप्तेऽपि शीत्कारितं
तद्वीचीसुखतर्जनं किमु हरेः स्वश्रोत्ररन्ध्राश्रितम् ॥ १६७ ॥ (167)

adya shyaamakishoramaulirahaha praapto rajanyaa mukhe
neetvaa taam karayoh pragrihya sahasaa neepaataveem praavishat
shroshye talpamilanmahaaratibhare praapte'pi sheetkaaritam
tadveecheesukhatarjanam kimu hareh svashrotrarandhraashritam

आज संध्या को श्याम-किशोर अचानक उनके दोनों हाथ पकड़कर उन्हें कदम्ब-वन में ले गए। एकांत लीला की भाषा में सखी उनके आनंद की ध्वनि सुनने की अभिलाषा करती है।

श्रीमद्राधे त्वमथ मधुरं श्रीयशोदाकुमारे
प्राप्ते कैशोरकमतिरसाद्वल्गसे साधुयोगम् ।
इत्थं बाले महसि कथया नित्यलीलावयःश्री
जातावेशा प्रकटसहजा किन्नु दृश्या किशोरी ॥ १६८ ॥ (168)

shreemadraadhe tvamatha madhuram shreeyashodaakumaare
praapte kaishorakamatirasaadvalgase saadhuyogam
ittham baale mahasi kathayaa nityaleelaavayahshree
jaataaveshaa prakatasahajaa kinnu drishyaa kishoree

"हे श्रीराधे! यशोदानंदन किशोर हो गए हैं, और प्रेम के वश आप भी उसी मधुर मिलन की ओर बढ़ रही हैं।" इतना कहते ही जो नित्य किशोरावस्था में प्रवेश कर गईं, क्या वह किशोरी हमें दिखाई देंगी?

एकं काञ्चनचम्पकच्छवि परं नीलाम्बुदश्यामलं
कन्दर्पोत्तरलं तथैकमपरं नैवानुकूलं बहिः ।
किञ्चैकं बहुमानभङ्गि रसवच्चाटूनि कुर्वत्परं
वीक्षे क्रीडति कुञ्जसीम्नि तदहो द्वन्द्वं महामोहनम् ॥ १६९ ॥ (169)

ekam kaanchanachampakachchhavi param neelaambudashyaamalam
kandarpottaralam tathaikamaparam naivaanukoolam bahih
kinchaikam bahumaanabhangi rasavachchaatooni kurvatparam
veekshe kreedati kunjaseemni tadaho dvandvam mahaamohanam

एक सुनहरे चम्पा जैसा, दूसरा नीले मेघ जैसा श्याम; एक प्रेम से चंचल, दूसरा ऊपर से उदासीन; एक मान की भंगिमाओं से भरा, दूसरा मीठी मनुहार करता: अहो, कुञ्ज की सीमा में खेलते उस महा-मोहन युगल को देखो।

विचित्ररतिविक्रमं दधदनुक्रमादाकुलं
महामदनवेगतो निभृतमञ्जुकुञ्जोदरे ।
अहो विनिमयन्नवं किमपि नीलपीतं पटं
मिथो मिलितमद्भुतं जयति पीतनीलं महः ॥ १७० ॥ (170)

vichitrarativikramam dadhadanukramaadaakulam
mahaamadanavegato nibhritamanjukunjodare
aho vinimayannavam kimapi neelapeetam patam
mitho militamadbhutam jayati peetaneelam mahah

एकांत सुंदर कुञ्ज में प्रेम के वेग से आकुल होकर वे अपने नीले-पीले वस्त्र आपस में बदल लेते हैं। परस्पर मिली वह अद्भुत पीत-नील ज्योति जय पाए।

करे कमलमद्भुतं भ्रमयतोर्मिथोंसार्पित
स्फुरत्पुलकदोर्लतायुगलयोः स्मरोन्मत्तयोः ।
सहासरसपेशलं मदकरीन्द्रभङ्गीशतै
र्गतिं रसिकयोर्द्वयोः स्मरत चारुवृन्दावने ॥ १७१ ॥ (171)

kare kamalamadbhutam bhramayatormithomsaarpita
sphuratpulakadorlataayugalayoh smaronmattayoh
sahaasarasapeshalam madakareendrabhangeeshatai
rgatim rasikayordvayoh smarata chaaruvrindaavane

हाथ में अद्भुत कमल घुमाते, एक-दूसरे के कंधों पर पुलकित भुजाएँ रखे, प्रेम में मतवाले, हँसी से भरे और मदमस्त गजराज जैसी चाल वाले रसिक युगल का, हे मन, सुंदर वृंदावन में स्मरण कर।

खेलन्मुग्धाक्षिमीनस्फुरदधरमणीविद्रुमश्रोणिभार
द्वीपायामोत्तरङ्गस्मरकलभकटाटोपवक्षोरुहायाः ।
गम्भीरावर्तनाभेर्बहलहरिमहाप्रेमपीयूषसिन्धोः
श्रीराधायाः पदाम्भोरुहपरिचरणे योग्यतामेव मृग्ये ॥ १७२ ॥ (172)

khelanmugdhaakshimeenasphuradadharamaneevidrumashronibhaara
dveepaayaamottarangasmarakalabhakataatopavakshoruhaayaah
gambheeraavartanaabherbahalaharimahaapremapeeyooshasindhoh
shreeraadhaayaah padaambhoruhaparicharane yogyataameva mrigye

शास्त्रीय काव्य की भाषा में: मछलियों जैसे चंचल नेत्र, मूँगे जैसे अधर, भँवर जैसी गहरी नाभि, हरि के महाप्रेम का अमृत-सागर। मैं केवल श्रीराधा के चरण-कमलों की सेवा के योग्य बनना चाहती हूँ।

विच्छेदाभासमानादहह निमिषतो गात्रविस्रंसनादौ
चञ्चत्कल्पाग्निकोटिज्वलितमिव भवेद्बाह्यमभ्यन्तरं च ।
गाढस्नेहानुबन्धग्रथितमिव ययोरद्भुतप्रेममूर्त्योः
श्रीराधामाधवाख्यं परमिह मधुरं तद्द्वयं धाम जाने ॥ १७३ ॥ (173)

vichchhedaabhaasamaanaadahaha nimishato gaatravisramsanaadau
chanchatkalpaagnikotijvalitamiva bhavedbaahyamabhyantaram cha
gaadhasnehaanubandhagrathitamiva yayoradbhutapremamoortyoh
shreeraadhaamaadhavaakhyam paramiha madhuram taddvayam dhaama jaane

पलक झपकने भर के वियोग का आभास भी जिन्हें भीतर-बाहर करोड़ों प्रलय-अग्नियों जैसा जलाता है, गहरे स्नेह से गुँथे उन अद्भुत प्रेम-मूर्ति श्रीराधा-माधव युगल को ही मैं परम मधुर आश्रय जानती हूँ।

कदा रत्युन्मुक्तं कचभरमहं संयमयिता
कदा वा सन्धास्ये त्रुटितनवमुक्तावलिमपि ।
कदा वा कस्तूर्यास्तिलकमपि भूयो रचयिता
निकुञ्जान्तर्वृत्ते नवरतिरणे यौवनमणेः ॥ १७४ ॥ (174)

kadaa ratyunmuktam kachabharamaham samyamayitaa
kadaa vaa sandhaasye trutitanavamuktaavalimapi
kadaa vaa kastooryaastilakamapi bhooyo rachayitaa
nikunjaantarvritte navaratirane yauvanamaneh

निकुञ्ज की नव केलि के बाद, उन यौवन-मणि के खुले केश मैं कब बाँधूँगी, उनकी टूटी मोती-माला कब पिरोऊँगी, और कस्तूरी का तिलक फिर से कब रचूँगी?

किं ब्रूमोऽन्यत्र कुण्ठीकृतकजनपदे धाम्न्यपि श्रीविकुण्ठे
राधामाधुर्यवेत्ता मधुपतिरथ तन्माधुरीं वेत्ति राधा ।
वृन्दारण्यस्थलीयं परमरससुधामाधुरीणां धुरीणा
तद्द्वन्द्वं स्वादनीयं सकलमपि ददौ राधिकाकिङ्करीभ्यः ॥ १७५ ॥ (175)

kim broomo'nyatra kuntheekritakajanapade dhaamnyapi shreevikunthe
raadhaamaadhuryavettaa madhupatiratha tanmaadhureem vetti raadhaa
vrindaaranyasthaleeyam paramarasasudhaamaadhureenaam dhureenaa
taddvandvam svaadaneeyam sakalamapi dadau raadhikaakinkareebhyah

और जगह की तो बात ही क्या, वैकुण्ठ भी यहाँ फीका है। राधा का माधुर्य केवल मधुपति जानते हैं और उनका माधुर्य केवल राधा। रस-सुधा में सबसे आगे इस वृंदावन ने वह आस्वादनीय युगल पूरा का पूरा श्रीराधा की किंकरियों को दे दिया है।

लसद्वदनपङ्कजा नवगभीरनाभिभ्रमा
नितम्बपुलिनोल्लसन्मुखरकाञ्चिकादम्बिनी ।
विशुद्धरसवाहिनी रसिकसिन्धुसङ्गोन्मदा
सदा सुरतरङ्गिणी जयति कापि वृन्दावने ॥ १७६ ॥ (176)

lasadvadanapankajaa navagabheeranaabhibhramaa
nitambapulinollasanmukharakaanchikaadambinee
vishuddharasavaahinee rasikasindhusangonmadaa
sadaa surataranginee jayati kaapi vrindaavane

वृंदावन में एक अनोखी देव-नदी है: मुख ही कमल, नाभि ही भँवर, करधनी ही तट पर छाए मेघ, जो शुद्ध रस बहाती है और रसिक-सागर से मिलने को उन्मत्त है। उसकी सदा जय हो।

अनङ्गनवरङ्गिणी रसतरङ्गिणी सङ्गतां
दधत्सुखसुधामये स्वतनुनीरधौ राधिकाम् ।
अहो मधुपकाकलीमधुरमाधवीमण्डपे
स्मरक्षुभितमेधते सुरतसीधुमत्तं महः ॥ १७७ ॥ (177)

ananganavaranginee rasataranginee sangataam
dadhatsukhasudhaamaye svatanuneeradhau raadhikaam
aho madhupakaakaleemadhuramaadhaveemandape
smarakshubhitamedhate surataseedhumattam mahah

भौंरों की मधुर गुंजार वाले माधवी-मंडप में एक दिव्य ज्योति बढ़ती जा रही है, जिसने अपने सुख-सागर में कामदेव को भी आनंदित करने वाली रस-तरंगिणी श्रीराधिका को धारण कर रखा है।

रोमालीमिहिरात्मजा सुललिते बन्धूकबन्धुप्रभा
सर्वाङ्गे स्फुटचम्पकच्छविरहो नाभीसरःशोभना ।
वक्षोजस्तवका लसद्भुजलता शिञ्जापतज्झङ्कृतिः
श्रीराधा हरते मनो मधुपतेरन्येव वृन्दाटवी ॥ १७८ ॥ (178)

romaaleemihiraatmajaa sulalite bandhookabandhuprabhaa
sarvaange sphutachampakachchhaviraho naabheesarahshobhanaa
vakshojastavakaa lasadbhujalataa shinjaapatajjhankritih
shreeraadhaa harate mano madhupateranyeva vrindaatavee

मानो दूसरा वृंदावन: रोमावली यमुना है, कांति बंधूक-पुष्प जैसी, अंगों में चम्पा की छवि, नाभि सरोवर, भुजाएँ लताएँ और आभूषणों की ध्वनि भौंरों की गुंजार। ऐसी श्रीराधा मधुपति का मन हर लेती हैं।

राधामाधवयोर्विचित्रसुरतारम्भे निकुञ्जोदर
स्रस्तप्रस्तरसङ्गतैर्वपुरलङ्कुर्वेऽङ्गरागैः कदा ।
तत्रैव त्रुटिताः स्रजो निपतिताः सन्धाय भूयः कदा
कण्ठे धारयितास्मि मार्जनकृते प्रातः प्रविष्टास्म्यहम् ॥ १७९ ॥ (179)

raadhaamaadhavayorvichitrasurataarambhe nikunjodara
srastaprastarasangatairvapuralankurve'ngaraagaih kadaa
tatraiva trutitaah srajo nipatitaah sandhaaya bhooyah kadaa
kanthe dhaarayitaasmi maarjanakrite praatah pravishtaasmyaham

प्रातः निकुञ्ज-मंदिर बुहारने जाकर, शय्या पर गिरे अंगराग से अपना शरीर कब सजाऊँगी, और वहीं टूटकर गिरी मालाओं को फिर से पिरोकर कब अपने गले में पहनूँगी?

श्लोकान्प्रेष्ठयशोऽङ्कितान्गृहशुकानध्यापयेत्कर्हिचि
द्गुञ्जामञ्जुलहारबर्हमुकुटं निर्माति काले क्वचित् ।
आलिख्य प्रियमूर्तिमाकुलकुचौ सङ्घट्टयेद्वा कदा
प्येवं व्यापृतिभिर्दिनं नयति मे राधा प्रियस्वामिनी ॥ १८० ॥ (180)

shlokaanpreshthayasho'nkitaangrihashukaanadhyaapayetkarhichi
dgunjaamanjulahaarabarhamukutam nirmaati kaale kvachit
aalikhya priyamoortimaakulakuchau sanghattayedvaa kadaa
pyevam vyaapritibhirdinam nayati me raadhaa priyasvaaminee

कभी घर के तोतों को प्रियतम के यश वाले श्लोक सिखाती हैं, कभी गुंजा का हार और मोर-मुकुट बनाती हैं, कभी प्रियतम का चित्र बनाकर उसे हृदय से लगा लेती हैं, इस प्रकार मेरी प्रिय स्वामिनी श्रीराधा वियोग का दिन बिताती हैं।

प्रेयःसङ्गसुधासदानुभविनी भूयो भवद्भाविनी
लीलापञ्चमरागिणी रतिकलाभङ्गीशतोद्भाविनी ।
कारुण्यद्रवभाविनी कटितटे काञ्चीकलाराविणी
श्रीराधैव गतिर्ममास्तु पदयोः प्रेमामृतस्राविणी ॥ १८१ ॥ (181)

preyahsangasudhaasadaanubhavinee bhooyo bhavadbhaavinee
leelaapanchamaraaginee ratikalaabhangeeshatodbhaavinee
kaarunyadravabhaavinee katitate kaancheekalaaraavinee
shreeraadhaiva gatirmamaastu padayoh premaamritasraavinee

जो सदा प्रियतम के संग-सुधा का अनुभव करती हैं, नित्य नवीन हैं, लीला में पंचम राग गाती हैं, रति-कला की सैकड़ों भंगिमाएँ रचती हैं, करुणा से द्रवित हैं, जिनकी करधनी बजती है और चरणों से प्रेमामृत झरता है, वे श्रीराधा ही मेरी गति हैं।

कोटीन्दुच्छविहासिनी नवसुधासम्भारसम्भाषिणी
वक्षोजद्वितयेन हेमकलशश्रीगर्वनिर्वासिनी ।
चित्रग्रामनिवासिनी नवनवप्रेमोत्सवोल्लासिनी
वृन्दारण्यविलासिनी किमु रहो भूयाद्धृदुल्लासिनी ॥ १८२ ॥ (182)

koteenduchchhavihaasinee navasudhaasambhaarasambhaashinee
vakshojadvitayena hemakalashashreegarvanirvaasinee
chitragraamanivaasinee navanavapremotsavollaasinee
vrindaaranyavilaasinee kimu raho bhooyaaddhridullaasinee

जिनकी मुसकान करोड़ों चन्द्रों की छवि का उपहास करती है, जिनकी वाणी नए अमृत से भरी है, जो सोने के कलशों का गर्व भी उतार देती हैं, चित्रग्राम (बरसाना) में रहती हैं और वृंदावन में विहार करती हैं, क्या वे एकांत में मेरे हृदय को उल्लास देंगी?

कदा गोविन्दाराधनललितताम्बूलशकलं
मुदा स्वादं स्वादं पुलकिततनुर्मे प्रियसखी ।
दुकूलेनोन्मीलन्नवकमलकिञ्जल्करुचिना
निवीताङ्गी सङ्गीतकनिजकलाः शिक्षयति माम् ॥ १८३ ॥ (183)

kadaa govindaaraadhanalalitataamboolashakalam
mudaa svaadam svaadam pulakitatanurme priyasakhee
dukoolenonmeelannavakamalakinjalkaruchinaa
niveetaangee sangeetakanijakalaah shikshayati maam

गोविन्द की आराधना से प्राप्त सुंदर पान का बार-बार स्वाद लेकर पुलकित, कमल-केसर के रंग का वस्त्र पहने, मेरी प्रिय सखी (ललिता) मुझे संगीत की अपनी कलाएँ कब सिखाएँगी?

लसद्दशनमौक्तिकप्रवरकान्तिपूरस्फुर
न्मनोज्ञनवपल्लवाधरमणिच्छटासुन्दरम् ।
चरन्मकरकुण्डलं चकितचारुनेत्राञ्चलं
स्मरामि तव राधिके वदनमण्डलं निर्मलम् ॥ १८४ ॥ (184)

lasaddashanamauktikapravarakaantipoorasphura
nmanojnanavapallavaadharamanichchhataasundaram
charanmakarakundalam chakitachaarunetraanchalam
smaraami tava raadhike vadanamandalam nirmalam

हे राधिके! मोतियों जैसे चमकते दाँत, मूँगे से भी सुंदर नए पल्लव जैसे अधर, हिलते मकर-कुंडल और चकित, सुंदर नेत्र-कोण, आपके उस निर्मल मुख-मंडल का मैं स्मरण करती हूँ।

चलत्कुटिलकुन्तलं तिलकशोभिभालस्थलं
तिलप्रसवनासिकापुटविराजिमुक्ताफलम् ।
कलङ्करहितामृतच्छविसमुज्ज्वलं राधिके
तवातिरतिपेशलं वदनमण्डलं भावये ॥ १८५ ॥ (185)

chalatkutilakuntalam tilakashobhibhaalasthalam
tilaprasavanaasikaaputaviraajimuktaaphalam
kalankarahitaamritachchhavisamujjvalam raadhike
tavaatiratipeshalam vadanamandalam bhaavaye

हिलती घुँघराली लटें, तिलक से शोभित माथा, तिल-पुष्प जैसी नासिका में चमकता मोती, और निष्कलंक चन्द्रमा जैसी उज्ज्वल छवि, हे राधिके, आपके उस अति प्रेम-भरे मुख-मंडल का मैं ध्यान करती हूँ।

पूर्णप्रेमामृतरससमुल्लाससौभाग्यसारं
कुञ्जे कुञ्जे नवरतिकलाकौतुकेनात्तकेलि ।
उत्फुल्लेन्दीवरकनकयोः कान्तिचोरं किशोरं
ज्योतिर्द्वन्द्वं किमपि परमानन्दकन्दं चकास्ति ॥ १८६ ॥ (186)

poornapremaamritarasasamullaasasaubhaagyasaaram
kunje kunje navaratikalaakautukenaattakeli
utphullendeevarakanakayoh kaantichoram kishoram
jyotirdvandvam kimapi paramaanandakandam chakaasti

पूर्ण प्रेमामृत-रस के उल्लास का सार, कुञ्ज-कुञ्ज में नई रति-कला के कौतुक से केलि करती, खिले नील-कमल और स्वर्ण-कमल की कांति चुराती, परमानंद की मूल वह किशोर युगल-ज्योति प्रकाशित है।

ययोन्मीलत्केलीविलसितकटाक्षैककलया
कृतो वन्दी वृन्दाविपिनकलभेन्द्रो मदकलः ।
जडीभूतः क्रीडामृग इव यदाज्ञालवकृते
कृती नः सा राधा शिथिलयतु साधारणगतिम् ॥ १८७ ॥ (187)

yayonmeelatkeleevilasitakataakshaikakalayaa
krito vandee vrindaavipinakalabhendro madakalah
jadeebhootah kreedaamriga iva yadaajnaalavakrite
kritee nah saa raadhaa shithilayatu saadhaaranagatim

जिन्होंने अपनी केलि-भरी एक ही चितवन से वृंदावन के मतवाले गजराज-किशोर (श्रीकृष्ण) को बंदी बना लिया है, जो उनकी ज़रा-सी आज्ञा के लिए क्रीड़ा-मृग की तरह ठिठके रहते हैं, वे श्रीराधा हमारी सांसारिक गति को शिथिल करें।

श्रीगोपेन्द्रकुमारमोहनमहाविद्ये स्फुरन्माधुरी
सारस्फाररसाम्बुराशिसहजप्रस्यन्दिनेत्राञ्चले ।
कारुण्यार्द्रकटाक्षभङ्गिमधुरस्मेराननाम्भोरुहे
हा हा स्वामिनि राधिके मयि कृपादृष्टिं मनाङ्निक्षिप ॥ १८८ ॥ (188)

shreegopendrakumaaramohanamahaavidye sphuranmaadhuree
saarasphaararasaamburaashisahajaprasyandinetraanchale
kaarunyaardrakataakshabhangimadhurasmeraananaambhoruhe
haa haa svaamini raadhike mayi kripaadrishtim manaannikshipa

हे गोपेन्द्र-कुमार को मोहने वाली महाविद्ये! जिनके नेत्र-कोण माधुरी के रस-सागर को सहज बहाते हैं, जिनकी चितवन करुणा से भीगी है और मुख-कमल मधुर मुसकान से भरा है, हा स्वामिनी राधिके, मुझ पर थोड़ी-सी कृपा-दृष्टि डालिए।

ओष्ठप्रान्तोच्छलितदयितोद्गीर्णताम्बूलरागा
रागानुच्चैर्निजरचितया चित्रभङ्ग्योन्नयन्ती ।
तिर्यग्ग्रीवा रुचिररुचिरोदञ्चदाकुञ्चितभ्रूः
प्रेयःपार्श्वे विपुलपुलकैर्मण्डिता भाति राधा ॥ १८९ ॥ (189)

oshthapraantochchhalitadayitodgeernataamboolaraagaa
raagaanuchchairnijarachitayaa chitrabhangyonnayantee
tiryaggreevaa ruchiraruchirodanchadaakunchitabhrooh
preyahpaarshve vipulapulakairmanditaa bhaati raadhaa

प्रियतम के दिए पान से जिनके होठ लाल हैं, जो अपनी रची रागिनियाँ विचित्र ढंग से ऊँचे स्वर में गा रही हैं, जिनकी ग्रीवा थोड़ी तिरछी और भौंहें ऊपर उठी हैं, पुलक से सजी वे श्रीराधा प्रियतम के पास शोभित हैं।

किं रे धूर्तप्रवर निकटं यासि नः प्राणसख्या
नूनं बाला कुचतटकरस्पर्शमात्राद्विमुह्येत् ।
इत्थं राधे पथि पथि रसान्नागरं तेऽनुलग्नं
क्षिप्त्वा भङ्ग्या हृदयमुभयोः कर्हि सम्मोहयिष्ये ॥ १९० ॥ (190)

kim re dhoortapravara nikatam yaasi nah praanasakhyaa
noonam baalaa kuchatatakarasparshamaatraadvimuhyet
ittham raadhe pathi pathi rasaannaagaram te'nulagnam
kshiptvaa bhangyaa hridayamubhayoh karhi sammohayishye

"अरे धूर्त-श्रेष्ठ, हमारी प्राण-प्यारी सखी के पास क्यों आता है?" हे राधे! इस प्रकार राह-राह आपके पीछे चलते रसिक नागर को हँसी-ठिठोली से हटाकर मैं आप दोनों के हृदय को कब मोहित करूँगी?

कदा वा राधायाः पदकमलमायोज्य हृदये
दयेशं निःशेषं नियतमिह जह्यामुपविधिम् ।
कदा वा गोविन्दः सकलसुखदः प्रेमकरणा
दनन्ये धन्ये वै स्वयमुपनयेत स्मरकलाम् ॥ १९१ ॥ (191)

kadaa vaa raadhaayaah padakamalamaayojya hridaye
dayesham nihshesham niyatamiha jahyaamupavidhim
kadaa vaa govindah sakalasukhadah premakaranaa
dananye dhanye vai svayamupanayeta smarakalaam

मैं कब श्रीराधा के करुणामय चरण-कमलों को हृदय में धारण करके सब बाहरी विधियों को छोड़ दूँगी? और कब सब सुख देने वाले गोविन्द प्रेमवश मुझ अनन्य को निकुञ्ज-सेवा की कला सिखाएँगे?

कदा वा प्रोद्दामस्मरसमरसंरम्भरभस
प्ररूढस्वेदाम्भःप्लुतलुलितचित्राखिलतनू ।
गतौ कुञ्जद्वारे सुखमरुति संवीज्य परया
मुदाहं श्रीराधारसिकतिलकौ स्यां सुकृतिनी ॥ १९२ ॥ (192)

kadaa vaa proddaamasmarasamarasamrambharabhasa
praroodhasvedaambhahplutalulitachitraakhilatanoo
gatau kunjadvaare sukhamaruti samveejya parayaa
mudaaham shreeraadhaarasikatilakau syaam sukritinee

जब युगल प्रेम-लीला के श्रम से भीगे और थके कुञ्ज-द्वार पर आएँ, तब मैं परम आनंद से उन्हें सुखद हवा झलकर कब पुण्यशालिनी बनूँगी?

मिथः प्रेमावेशाद्घनपुलकदोर्वल्लिरचित
प्रगाढाश्लेषेणोत्सवरसभरोन्मीलितदृशौ ।
निकुञ्जक्लृप्ते वै नवकुसुमतल्पेऽधिशयितौ
कदा पत्संवाहादिभिरहमधीशौ नु सुखये ॥ १९३ ॥ (193)

mithah premaaveshaadghanapulakadorvallirachita
pragaadhaashleshenotsavarasabharonmeelitadrishau
nikunjaklripte vai navakusumatalpe'dhishayitau
kadaa patsamvaahaadibhirahamadheeshau nu sukhaye

जब परस्पर प्रेमावेश से भुजाओं में बँधे, आनंद से अधखुले नेत्रों वाले मेरे दोनों स्वामी निकुञ्ज में नए फूलों की शय्या पर विश्राम करें, तब मैं उनके चरण दबाकर उन्हें कब सुख दूँगी?

मदारुणविलोचनं कनकदर्पकामोचनं
महाप्रणयमाधुरीरसविलासनित्योत्सुकम् ।
लसन्नववयःश्रिया ललितभङ्गिलीलामयं
हृदा तदहमुद्वहे किमपि हेमगौरं महः ॥ १९४ ॥ (194)

madaarunavilochanam kanakadarpakaamochanam
mahaapranayamaadhureerasavilaasanityotsukam
lasannavavayahshriyaa lalitabhangileelaamayam
hridaa tadahamudvahe kimapi hemagauram mahah

जिनके नेत्र आनंद से अरुण हैं, जो सोने का भी गर्व उतार देती हैं, जो महाप्रेम-माधुरी के विलास में सदा उत्सुक हैं और नव-यौवन की ललित भंगिमाओं से भरी हैं, उस अनिर्वचनीय हेम-गौर ज्योति को मैं हृदय में धारण करती हूँ।

मदाघूर्णन्नेत्रं नवरतिरसावेशविवशो
ल्लसद्गात्रं प्राणप्रणयपरिपाट्यां परतरम् ।
मिथो गाढाश्लेषाद्वलयमिव जातं मरकत
द्रुतस्वर्णच्छायं स्फुरतु मिथुनं तन्मम हृदि ॥ १९५ ॥ (195)

madaaghoornannetram navaratirasaaveshavivasho
llasadgaatram praanapranayaparipaatyaam parataram
mitho gaadhaashleshaadvalayamiva jaatam marakata
drutasvarnachchhaayam sphuratu mithunam tanmama hridi

आनंद से घूमते नेत्र, नए प्रेम में विवश, ऐसे गाढ़ आलिंगन में कि मानो पन्ने और पिघले सोने का एक ही कंगन बन गए हों, वह श्याम-गौर युगल मेरे हृदय में प्रकाशित हो।

परस्परं प्रेमरसे निमग्न
मशेषसम्मोहनरूपकेलि ।
वृन्दावनान्तर्नवकुञ्जगेहे
तन्नीलपीतं मिथुनं चकास्ति ॥ १९६ ॥ (196)

parasparam premarase nimagna
masheshasammohanaroopakeli
vrindaavanaantarnavakunjagehe
tanneelapeetam mithunam chakaasti

जो परस्पर प्रेम-रस में डूबे हैं और जिनकी केलि सबको मोहित करती है, वृंदावन के भीतर नए कुञ्ज-भवन में वह नील-पीत युगल शोभित है।

आशास्य दास्यं वृषभानुजाया
स्तीरे समध्यास्य च भानुजायाः ।
कदा नु वृन्दावनकुञ्जवीथी
ष्वहं नु राधे ह्यतिथिर्भवेयम् ॥ १९७ ॥ (197)

aashaasya daasyam vrishabhaanujaayaa
steere samadhyaasya cha bhaanujaayaah
kadaa nu vrindaavanakunjaveethee
shvaham nu raadhe hyatithirbhaveyam

वृषभानु-नन्दिनी की सेवा की आशा लेकर और यमुना-तट पर बसकर, हे राधे, मैं वृंदावन की कुञ्ज-गलियों में कब अतिथि बनूँगी?

कालिन्दीतटकुञ्जे
पुञ्जीभूतं रसामृतं किमपि ।
अद्भुतकेलिनिधानं
निरवधि राधाभिधानमुल्लसति ॥ १९८ ॥ (198)

kaalindeetatakunje
punjeebhootam rasaamritam kimapi
adbhutakelinidhaanam
niravadhi raadhaabhidhaanamullasati

यमुना-तट के कुञ्ज में इकट्ठा हुआ एक अनिर्वचनीय रसामृत, अद्भुत केलि की असीम निधि, राधा नाम से प्रकाशित है।

प्रीतिरिव मूर्तिमती
रससिन्धोः सारसम्पदिव विमला ।
वैदग्धीनां हृदयं
काचन वृन्दावनाधिकारिणी जयति ॥ १९९ ॥ (199)

preetiriva moortimatee
rasasindhoh saarasampadiva vimalaa
vaidagdheenaam hridayam
kaachana vrindaavanaadhikaarinee jayati

मूर्तिमती प्रीति, रस-सागर की निर्मल सार-संपत्ति, और चतुराई की हृदय, वे अनिर्वचनीय वृंदावनाधिकारिणी जय पाएँ।

रसघनमोहनमूर्तिं
विचित्रकेलिमहोत्सवोल्लसितम् ।
राधाचरणविलोडित
रुचिरशिखण्डं हरिं वन्दे ॥ २०० ॥ (200)

rasaghanamohanamoortim
vichitrakelimahotsavollasitam
raadhaacharanavilodita
ruchirashikhandam harim vande

मैं रस से घने मोहन-मूर्ति, विचित्र केलि-उत्सव से उल्लसित, और श्रीराधा-चरणों में लोटते सुंदर मोर-पंख वाले हरि की वंदना करती हूँ।

कदा गायं गायं मधुरमधुरीत्या मधुभिद
श्चरित्राणि स्फारामृतरसविचित्राणि बहुशः ।
मृजन्ती तत्केलीभवनमभिरामं मलयज
च्छटाभिः सिञ्चन्ती रसह्रदनिमग्नास्मि भविता ॥ २०१ ॥ (201)

kadaa gaayam gaayam madhuramadhureetyaa madhubhida
shcharitraani sphaaraamritarasavichitraani bahushah
mrijantee tatkeleebhavanamabhiraamam malayaja
chchhataabhih sinchantee rasahradanimagnaasmi bhavitaa

मधुसूदन के अमृत-रस से भरे अनेक विचित्र चरित्रों को मधुर रीति से बार-बार गाती हुई, उनके सुंदर केलि-भवन को बुहारती और चंदन-जल से सींचती हुई, मैं रस-सरोवर में कब निमग्न होऊँगी?

उदञ्चद्रोमाञ्चप्रचयखचितां वेपथुमतीं
दधानां श्रीराधामतिमधुरलीलामयतनुम् ।
कदा वा कस्तूर्या किमपि रचयन्त्येव कुचयो
र्विचित्रां पत्रालीमहमहह वीक्षे सुकृतिनी ॥ २०२ ॥ (202)

udanchadromaanchaprachayakhachitaam vepathumateem
dadhaanaam shreeraadhaamatimadhuraleelaamayatanum
kadaa vaa kastooryaa kimapi rachayantyeva kuchayo
rvichitraam patraaleemahamahaha veekshe sukritinee

पुलक से भरी, काँपती हुई, अति मधुर लीलामय तन वाली श्रीराधा पर कस्तूरी से विचित्र पत्रावली रचती हुई, मैं पुण्यवती होकर उनका दर्शन कब करूँगी?

क्षणं सीत्कुर्वन्ती क्षणमथ महावेपथुमती
क्षणं श्याम श्यामेत्यमुमभिलपन्ती पुलकिता ।
महाप्रेमा कापि प्रमदमदनोद्दामरसदा
सदानन्दा मूर्तिर्जयति वृषभानोः कुलमणिः ॥ २०३ ॥ (203)

kshanam seetkurvantee kshanamatha mahaavepathumatee
kshanam shyaama shyaametyamumabhilapantee pulakitaa
mahaapremaa kaapi pramadamadanoddaamarasadaa
sadaanandaa moortirjayati vrishabhaanoh kulamanih

कभी सिसकारी भरती, कभी अत्यंत काँपती, कभी "श्याम, श्याम" पुकारती पुलकित होती, महाप्रेम की मूर्ति और सदा आनंदमयी वृषभानु-कुल-मणि की जय हो।

यस्याः प्रेमघनाकृतेः पदनखज्योत्स्नाभरस्नापित
स्वान्तानां समुदेति कापि सरसा भक्तिश्चमत्कारिणी ।
सा मे गोकुलभूपनन्दनमनश्चोरी किशोरी कदा
दास्यं दास्यति सर्ववेदशिरसां यत्तद्रहस्यं परम् ॥ २०४ ॥ (204)

yasyaah premaghanaakriteh padanakhajyotsnaabharasnaapita
svaantaanaam samudeti kaapi sarasaa bhaktishchamatkaarinee
saa me gokulabhoopanandanamanashchoree kishoree kadaa
daasyam daasyati sarvavedashirasaam yattadrahasyam param

जिन प्रेमघन-मूर्ति के चरण-नखों की चाँदनी में नहाए हृदयों में एक अनोखी, रसमयी, चमत्कारी भक्ति उदित होती है, गोकुल-राजकुमार का मन चुराने वाली वे किशोरी मुझे सब वेदों का परम रहस्य अपना दास्य कब देंगी?

कामं तूलिकया करेण हरिणा यालक्तकैरङ्किता
नानाकेलिविदग्धगोपरमणीवृन्दे तथा वन्दिता ।
या सङ्गुप्ततया तथोपनिषदां हृद्येव विद्योतते
सा राधाचरणद्वयी मम गतिर्लास्यैकलीलामयी ॥ २०५ ॥ (205)

kaamam toolikayaa karena harinaa yaalaktakairankitaa
naanaakelividagdhagoparamaneevrinde tathaa vanditaa
yaa sanguptatayaa tathopanishadaam hridyeva vidyotate
saa raadhaacharanadvayee mama gatirlaasyaikaleelaamayee

जिन्हें स्वयं हरि ने अपने हाथ से तूलिका द्वारा महावर से सजाया है, जिनकी वंदना केलि-चतुर गोपियाँ करती हैं, और जो उपनिषदों के हृदय में गुप्त रूप से प्रकाशित हैं, नृत्य-लीलामय वे श्रीराधा-चरण मेरी गति हैं।

सान्द्रप्रेमरसौघवर्षिणि नवोन्मीलन्महामाधुरी
साम्राज्यैकधुरीणकेलिविभवत्कारुण्यकल्लोलिनि ।
श्रीवृन्दावनचन्द्रचित्तहरिणीबन्धुस्फुरद्वागुरे
श्रीराधे नवकुञ्जनागरि तव क्रीतास्मि दास्योत्सवैः ॥ २०६ ॥ (206)

saandrapremarasaughavarshini navonmeelanmahaamaadhuree
saamraajyaikadhureenakelivibhavatkaarunyakallolini
shreevrindaavanachandrachittaharineebandhusphuradvaagure
shreeraadhe navakunjanaagari tava kreetaasmi daasyotsavaih

हे घने प्रेम-रस की वर्षा करने वाली, नव-माधुरी के साम्राज्य से भरी करुणा की नदी, वृंदावन-चन्द्र के चित्त-मृग को बाँधने वाली डोरी, हे नवकुञ्ज-नागरी श्रीराधे, मैं आपके दास्य-उत्सवों पर बिक चुकी हूँ।

स्वेदापूरः कुसुमचयनैर्दूरतः कण्टकाङ्को
वक्षोजेऽस्यास्तिलकविलयो हन्त घर्माम्भसैव ।
ओष्ठः सख्या हिमपवनतः सव्रणो राधिके ते
क्रूरास्वेवं स्वघटितमहो गोपये प्रेष्ठसङ्गम् ॥ २०७ ॥ (207)

svedaapoorah kusumachayanairdooratah kantakaanko
vakshoje'syaastilakavilayo hanta gharmaambhasaiva
oshthah sakhyaa himapavanatah savrano raadhike te
krooraasvevam svaghatitamaho gopaye preshthasangam

सखी विनोद में योजना बनाती है कि वह छेड़ने वाली सखियों के सामने श्रीराधा के प्रियतम-मिलन के हर चिह्न को दूर से फूल चुनने या ठंडी हवा का परिणाम बताकर छिपा लेगी।

पातं पातं पदकमलयोः कृष्णभृङ्गेण तस्याः
स्मेरास्येन्दोर्मुकुलितकुचद्वन्द्वहेमारविन्दम् ।
पीत्वा वक्त्राम्बुजमतिरसान्नूनमन्तः प्रवेष्टु
मत्यावेशान्नखरशिखया पाट्यमानं किमीक्षे ॥ २०८ ॥ (208)

paatam paatam padakamalayoh krishnabhringena tasyaah
smeraasyendormukulitakuchadvandvahemaaravindam
peetvaa vaktraambujamatirasaannoonamantah praveshtu
matyaaveshaannakharashikhayaa paatyamaanam kimeekshe

एकांत लीला की भाषा में सखी कल्पना करती है कि श्रीकृष्ण भौंरे की तरह बार-बार श्रीराधा के चरण-कमलों पर गिरकर कुञ्ज में प्रवेश की प्रार्थना कर रहे हैं।

अहो तेऽमी कुञ्जास्तदनुपमरासस्थलमिदं
गिरिद्रोणी सैव स्फुरति रतिरङ्गे प्रणयिनी ।
न वीक्षे श्रीराधां हर हर कुतोऽपीति शतधा
विदीर्येत प्राणेश्वरि मम कदा हन्त हृदयम् ॥ २०९ ॥ (209)

aho te'mee kunjaastadanupamaraasasthalamidam
giridronee saiva sphurati ratirange pranayinee
na veekshe shreeraadhaam hara hara kuto'peeti shatadhaa
videeryeta praaneshvari mama kadaa hanta hridayam

अहो! ये वही कुञ्ज हैं, वही अनुपम रासस्थल, वही गोवर्धन की कंदराएँ; पर हाय, श्रीराधा कहीं दिखाई नहीं देतीं। हे प्राणेश्वरी, ऐसे में मेरा हृदय सौ टुकड़े होकर कब फट जाएगा?

इहैवाभूत्कुञ्जे नवरतिकला मोहनतनो
रहोऽत्रैवानृत्यद्दयितसहिता सा रसनिधिः ।
इति स्मारं स्मारं तव चरितपीयूषलहरीं
कदा स्यां श्रीराधे चकित इह वृन्दावनभुवि ॥ २१० ॥ (210)

ihaivaabhootkunje navaratikalaa mohanatano
raho'traivaanrityaddayitasahitaa saa rasanidhih
iti smaaram smaaram tava charitapeeyooshalahareem
kadaa syaam shreeraadhe chakita iha vrindaavanabhuvi

"इसी कुञ्ज में उनकी नई केलि हुई थी, यहीं वे रस-निधि प्रियतम के साथ नाची थीं।" इस प्रकार आपकी चरितामृत-लहरी का स्मरण करते हुए, हे श्रीराधे, मैं वृंदावन में कब चकित रह जाऊँगी?

श्रीमद्बिम्बाधरे ते स्फुरति नवसुधामाधुरीसिन्धुकोटि
र्नेत्रान्तस्ते विकीर्णाद्भुतकुसुमधनुश्चण्डसत्काण्डकोटिः ।
श्रीवक्षोजे तवातिप्रमदरसकलासारसर्वस्वकोटिः
श्रीराधे त्वत्पदाब्जात्स्रवति निरवधिप्रेमपीयूषकोटिः ॥ २११ ॥ (211)

shreemadbimbaadhare te sphurati navasudhaamaadhureesindhukoti
rnetraantaste vikeernaadbhutakusumadhanushchandasatkaandakotih
shreevakshoje tavaatipramadarasakalaasaarasarvasvakotih
shreeraadhe tvatpadaabjaatsravati niravadhipremapeeyooshakotih

हे श्रीराधे! आपके अधरों में नई अमृत-माधुरी के करोड़ों सागर हैं, नेत्र-कोणों से कामदेव के करोड़ों बाण बिखरते हैं, आपमें प्रेम-कला का सर्वस्व करोड़ों रूपों में है, और आपके चरणों से करोड़ों प्रेमामृत-धाराएँ निरंतर बहती हैं।

सान्द्रानन्दोन्मदरसघनप्रेमपीयूषमूर्तेः
श्रीराधाया अथ मधुपतेः सुप्तयोः कुञ्जतल्पे ।
कुर्वाणाहं मृदुमृदुपदाम्भोजसंवाहनानि
शय्यान्ते किं किमपि पतिता प्राप्ततन्द्रा भवेयम् ॥ २१२ ॥ (212)

saandraanandonmadarasaghanapremapeeyooshamoorteh
shreeraadhaayaa atha madhupateh suptayoh kunjatalpe
kurvaanaaham mridumridupadaambhojasamvaahanaani
shayyaante kim kimapi patitaa praaptatandraa bhaveyam

घने आनंद-रस की प्रेम-मूर्ति श्रीराधा और मधुपति जब कुञ्ज-शय्या पर सो जाएँ, तब उनके कोमल चरण दबाते-दबाते क्या मैं भी झपकी लेकर शय्या के पास ही लुढ़क जाऊँगी?

राधापादारविन्दोच्छलितनवरसप्रेमपीयूषपुञ्जे
कालिन्दीकूलकुञ्जे हृदि कलितमहोदारमाधुर्यभावः ।
श्रीवृन्दारण्यवीथीललितरतिकलानागरीं तां गरीयो
गम्भीरैकानुरागान्मनसि परिचरन्विस्मृतान्यः कदा स्याम् ॥ २१३ ॥ (213)

raadhaapaadaaravindochchhalitanavarasapremapeeyooshapunje
kaalindeekoolakunje hridi kalitamahodaaramaadhuryabhaavah
shreevrindaaranyaveetheelalitaratikalaanaagareem taam gareeyo
gambheeraikaanuraagaanmanasi paricharanvismritaanyah kadaa syaam

श्रीराधा-चरणों से छलकते प्रेमामृत से भरे यमुना-तट के कुञ्ज में, उदार माधुर्य-भाव से भरे हृदय से, वृंदावन की उन चतुर नागरी की मन में गहन प्रेम से सेवा करती हुई, मैं बाकी सब कब भूल जाऊँगी?

अदृष्ट्वा राधाङ्के निमिषमपि तं नागरमणिं
तया वा खेलन्तं ललितललितानङ्गकलया ।
कदाहं दुःखाब्धौ सपदि पतिता मूर्च्छितवती
न तामाश्वस्यार्तां सुचिरमनुशोचे निजदशाम् ॥ २१४ ॥ (214)

adrishtvaa raadhaanke nimishamapi tam naagaramanim
tayaa vaa khelantam lalitalalitaanangakalayaa
kadaaham duhkhaabdhau sapadi patitaa moorchchhitavatee
na taamaashvasyaartaam suchiramanushoche nijadashaam

प्रियतम को एक पल भी श्रीराधा के अंक में न देखकर, मैं दुःख-सागर में गिरकर मूर्च्छित हो जाऊँ, और उन वियोग-व्याकुल को सांत्वना न दे पाने पर अपनी दशा पर देर तक शोक करूँ, ऐसा कब होगा?

भूयो भूयः कमलनयने किं मुधा वार्यतेऽसौ
वाङ्मात्रेऽपि त्वदनुगमनं न त्यजत्येव धूर्तः ।
किञ्चिद्राधे कुरु कुचतटीप्रान्तमस्य म्रदीयं
चक्षुर्द्वारा तमनुपतितं चूर्णतामेतु चेतः ॥ २१५ ॥ (215)

bhooyo bhooyah kamalanayane kim mudhaa vaaryate'sau
vaanmaatre'pi tvadanugamanam na tyajatyeva dhoortah
kinchidraadhe kuru kuchatateepraantamasya mradeeyam
chakshurdvaaraa tamanupatitam choornataametu chetah

"हे कमलनयने, केवल वचनों से उन्हें बार-बार क्यों रोकती हो? वे धूर्त आपका पीछा नहीं छोड़ते।" लीला की भाषा में सखी विनोद से श्रीराधा से कहती है कि उनके सौंदर्य से उनका कोमल चित्त बँध जाए।

किं वा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ तदुदितैर्वर्त्मभिः सद्गृहीतै
र्यत्रास्ति प्रेममूर्तेर्नहि महिमसुधा नापि भावस्तदीयः ।
किं वा वैकुण्ठलक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र मे नास्ति राधा
किन्त्वाशाप्यस्तु वृन्दावनभुवि मधुरा कोटिजन्मान्तरेऽपि ॥ २१६ ॥ (216)

kim vaa nastaih sushaastraih kimatha taduditairvartmabhih sadgriheetai
ryatraasti premamoorternahi mahimasudhaa naapi bhaavastadeeyah
kim vaa vaikunthalakshmyaapyahaha paramayaa yatra me naasti raadhaa
kintvaashaapyastu vrindaavanabhuvi madhuraa kotijanmaantare'pi

जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा की महिमा-सुधा और भाव नहीं, उन शास्त्रों और मार्गों से हमें क्या? जहाँ राधा नहीं, उस वैकुण्ठ-लक्ष्मी से भी क्या? करोड़ों जन्मों तक वृंदावन-भूमि की मधुर आशा बनी रहे।

श्याम श्यामेत्यनुपमरसापूर्णवर्णैर्जपन्ती
स्थित्वा स्थित्वा मधुरमधुरोत्तारमुच्चारयन्ती ।
मुक्तास्थूलान्नयनगलितानश्रुबिन्दून्वहन्ती
हृष्यद्रोमा प्रतिपदि चमत्कुर्वती पातु राधा ॥ २१७ ॥ (217)

shyaama shyaametyanupamarasaapoornavarnairjapantee
sthitvaa sthitvaa madhuramadhurottaaramuchchaarayantee
muktaasthoolaannayanagalitaanashrubindoonvahantee
hrishyadromaa pratipadi chamatkurvatee paatu raadhaa

अनुपम रस से भरे "श्याम, श्याम" अक्षरों का जप करती, रुक-रुककर मधुर स्वर में पुकारती, मोतियों जैसे बड़े आँसू बहाती, पुलकित और हर पग पर चकित होती श्रीराधा हमारी रक्षा करें।

तादृङ्मूर्तिर्व्रजपतिसुतः पादयोर्मे पतित्वा
दन्ताग्रेणाथ धृत्वा तृणकममलान्काकुवादान्ब्रवीति ।
नित्यं चानुव्रजति कुरुते सङ्गमायोद्यमं चे
त्युद्वेगं मे प्रणयिनि किमावेदयेयं नु राधे ॥ २१८ ॥ (218)

taadrinmoortirvrajapatisutah paadayorme patitvaa
dantaagrenaatha dhritvaa trinakamamalaankaakuvaadaanbraveeti
nityam chaanuvrajati kurute sangamaayodyamam che
tyudvegam me pranayini kimaavedayeyam nu raadhe

"हे प्रणयिनी राधे! वे मोहन-मूर्ति ब्रजराज-कुमार दाँतों में तिनका दबाए मेरे चरणों में गिरकर विनती करते हैं, सदा मेरे पीछे चलते हैं और आपसे मिलाने का प्रयत्न करते हैं; अपनी यह व्याकुलता मैं आपसे कैसे कहूँ?"

चलल्लीलागत्या क्वचिदनुचलद्धंसमिथुनं
क्वचित्केकिन्यग्रे कृतनटनचन्द्रक्यनुकृति ।
लताश्लिष्टं शाखिप्रवरमनुकुर्वत्क्वचिदहो
विदग्धद्वन्द्वं तद्रमत इह वृन्दावनभुवि ॥ २१९ ॥ (219)

chalalleelaagatyaa kvachidanuchaladdhamsamithunam
kvachitkekinyagre kritanatanachandrakyanukriti
lataashlishtam shaakhipravaramanukurvatkvachidaho
vidagdhadvandvam tadramata iha vrindaavanabhuvi

कभी हंसों के जोड़े की तरह लीला-भरी चाल से, कभी मोरनी के आगे नाचते मोर की तरह, कभी पेड़ से लिपटी लता की तरह, वह चतुर युगल वृंदावन में विहार करता है।

व्याकोशेन्दीवरमथ रुचा हारि हेमारविन्दं
कालिन्दीयं सुरभिमनिलं शीतलं सेवमानम् ।
सान्द्रानन्दं नवनवरसं प्रोल्लसत्केलिवृन्दं
ज्योतिर्द्वन्द्वं मधुरमधुरं प्रेमकन्दं चकास्ति ॥ २२० ॥ (220)

vyaakoshendeevaramatha ruchaa haari hemaaravindam
kaalindeeyam surabhimanilam sheetalam sevamaanam
saandraanandam navanavarasam prollasatkelivrindam
jyotirdvandvam madhuramadhuram premakandam chakaasti

जिन्होंने अपनी कांति से खिले नील-कमल और स्वर्ण-कमल की शोभा हर ली है, जो यमुना की सुगंधित शीतल हवा का सेवन करते हैं, घने आनंद, नित्य नवीन रस और केलि से भरी वह मधुर प्रेम-मूल युगल-ज्योति शोभित है।

कदा मधुरसारिकाः स्वरसपद्यमध्यापय
त्प्रदाय करतालिकाः क्वचन नर्तयत्केकिनम् ।
क्वचित्कनकवल्लरीवृततमाललीलाधनं
विदग्धमिथुनं तदद्भुतमुदेति वृन्दावने ॥ २२१ ॥ (221)

kadaa madhurasaarikaah svarasapadyamadhyaapaya
tpradaaya karataalikaah kvachana nartayatkekinam
kvachitkanakavallareevritatamaalaleelaadhanam
vidagdhamithunam tadadbhutamudeti vrindaavane

कभी मधुर मैनाओं को अपने रस के पद सिखाते, कभी ताली बजाकर मोरों को नचाते, कभी सुनहरी लता से लिपटे तमाल जैसे शोभित, वह अद्भुत चतुर युगल वृंदावन में प्रकाशित होता है।

पत्रालीं ललितां कपोलफलके नेत्राम्बुजे कज्जलं
रङ्गं बिम्बफलाधरे च कुचयोः काश्मीरजालेपनम् ।
श्रीराधे नवसङ्गमाय तरले पादाङ्गुलीपङ्क्तिषु
न्यस्यन्ती प्रणयादलक्तकरसं पूर्णा कदा स्यामहम् ॥ २२२ ॥ (222)

patraaleem lalitaam kapolaphalake netraambuje kajjalam
rangam bimbaphalaadhare cha kuchayoh kaashmeerajaalepanam
shreeraadhe navasangamaaya tarale paadaanguleepanktishu
nyasyantee pranayaadalaktakarasam poornaa kadaa syaamaham

आपके कपोलों पर पत्रावली, कमल-नयनों में काजल, अधरों पर रंग और अंगों पर केसर लगाकर, और प्रियतम से मिलने को उतावली आपके पैरों की उँगलियों में प्रेम से महावर लगाकर, हे श्रीराधे, मैं कब पूर्ण-मनोरथ बनूँगी?

श्रीगोवर्धन एक एव भवता पाणौ प्रयत्नाद्धृतो
राधावर्ष्मणि हेमशैलयुगले दृष्टेऽपि ते स्याद्भयम् ।
तद्गोपेन्द्रकुमार मा कुरु वृथा गर्वं परीहासतः
कर्ह्येवं वृषभानुनन्दिनि तव प्रेयांसमाभाषये ॥ २२३ ॥ (223)

shreegovardhana eka eva bhavataa paanau prayatnaaddhrito
raadhaavarshmani hemashailayugale drishte'pi te syaadbhayam
tadgopendrakumaara maa kuru vrithaa garvam pareehaasatah
karhyevam vrishabhaanunandini tava preyaamsamaabhaashaye

"हे गोपेन्द्र-कुमार! तुमने तो एक ही गोवर्धन बड़े प्रयत्न से उठाया था, व्यर्थ गर्व क्यों करते हो?" हे वृषभानु-नन्दिनी, आपको प्रसन्न करने के लिए मैं आपके प्रियतम से ऐसा परिहास कब करूँगी?

अनङ्गजयमङ्गलध्वनितकिङ्किणीडिण्डिम
स्तनादिवरताडनैर्नखरदन्तघातैर्युतः ।
अहो चतुरनागरीनवकिशोरयोर्मञ्जुले
निकुञ्जनिलयाजिरे रतिरणोत्सवो जृम्भते ॥ २२४ ॥ (224)

anangajayamangaladhvanitakinkineedindima
stanaadivarataadanairnakharadantaghaatairyutah
aho chaturanaagareenavakishorayormanjule
nikunjanilayaajire ratiranotsavo jrimbhate

शास्त्रीय श्रृंगार-काव्य की भाषा में यह श्लोक सुंदर निकुञ्ज में चतुर नागरी और नव-किशोर की प्रेम-क्रीड़ा का रूपक से वर्णन करता है।

यूनोर्वीक्ष्य दरत्रपानटकलामादीक्षयन्ती दृशौ
वृण्वाना चकितेन सञ्चितमहारत्नस्तनं चाप्युरः ।
सा काचिद्वृषभानुवेश्मनि सखीमालासु बालावली
मौलिः खेलति विश्वमोहनमहासारूप्यमाचिन्वती ॥ २२५ ॥ (225)

yoonorveekshya daratrapaanatakalaamaadeekshayantee drishau
vrinvaanaa chakitena sanchitamahaaratnastanam chaapyurah
saa kaachidvrishabhaanuveshmani sakheemaalaasu baalaavalee
maulih khelati vishvamohanamahaasaaroopyamaachinvatee

वृषभानु-भवन में सखियों के साथ खेलती, किसी युगल की लज्जा-भरी नटकला देखकर यौवन की पहली दीक्षा लेती, विश्व-मोहन सौंदर्य संचित करती वे बालाओं की मुकुटमणि क्रीड़ा कर रही हैं।

ज्योतिःपुञ्जद्वयमिदमहो मण्डलाकारमस्या
वक्षस्युन्मादयति हृदयं किं फलत्यन्यदग्रे ।
भ्रूकोदण्डं नकृतघटनं सत्कटाक्षौघबाणैः
प्राणान्हन्यात्किमु परमतो भावि भूयो न जाने ॥ २२६ ॥ (226)

jyotihpunjadvayamidamaho mandalaakaaramasyaa
vakshasyunmaadayati hridayam kim phalatyanyadagre
bhrookodandam nakritaghatanam satkataakshaughabaanaih
praanaanhanyaatkimu paramato bhaavi bhooyo na jaane

उनके खिलते यौवन की काव्य-भाषा में सखी उनके उस सौंदर्य पर विस्मित है जो अभी से हृदय को उन्मत्त करता है, और सोचती है कि आगे क्या होगा।

भोः श्रीदामन्सुबल वृषभस्तोककृष्णार्जुनाद्याः
किं वो दृष्टं मम नु चकिता दृग्गता नैव कुञ्जे ।
काचिद्देवी सकलभुवनाप्लाविलावण्यपूरा
दूरादेवाखिलमहरत प्रेयसो वस्तु सख्युः ॥ २२७ ॥ (227)

bhoh shreedaamansubala vrishabhastokakrishnaarjunaadyaah
kim vo drishtam mama nu chakitaa driggataa naiva kunje
kaachiddevee sakalabhuvanaaplaavilaavanyapooraa
dooraadevaakhilamaharata preyaso vastu sakhyuh

"हे श्रीदामा, सुबल, वृषभ, स्तोककृष्ण, अर्जुन आदि सखाओ! तुमने क्या देखा? मेरी चकित दृष्टि कुञ्ज में गई भी नहीं, फिर भी किसी देवी ने अपने सौंदर्य-प्रवाह से दूर से ही तुम्हारे सखा का सब कुछ हर लिया।"

गता दूरे गावो दिनमपि तुरीयांशमभज
द्वयं यातुं क्षान्तास्तव च जननी वर्त्मनयना ।
अकस्मात्तूष्णीके सजलनयने दीनवदने
लुठत्यस्यां भूमौ त्वयि नहि वयं प्राणिणिषवः ॥ २२८ ॥ (228)

gataa doore gaavo dinamapi tureeyaamshamabhaja
dvayam yaatum kshaantaastava cha jananee vartmanayanaa
akasmaattooshneeke sajalanayane deenavadane
luthatyasyaam bhoomau tvayi nahi vayam praaninishavah

"गायें दूर निकल गईं, दिन ढलने को है, हम थक चुके हैं, और तुम्हारी माँ राह देख रही हैं। तुम अचानक चुप, सजल नेत्र और उदास मुख होकर धरती पर पड़े हो; तुम्हारे बिना हम जीना नहीं चाहते।"

नासाग्रे नवमौक्तिकं सुरुचिरं स्वर्णोज्ज्वलं बिभ्रती
नानाभङ्गिरनङ्गरङ्गविलसल्लीलातरङ्गावलिः ।
राधे त्वं प्रविलोभय व्रजमणिं रत्नच्छटामञ्जरी
चित्रोदञ्चितकञ्चुकस्थगितयोर्वक्षोजयोः शोभया ॥ २२९ ॥ (229)

naasaagre navamauktikam suruchiram svarnojjvalam bibhratee
naanaabhangiranangarangavilasalleelaatarangaavalih
raadhe tvam pravilobhaya vrajamanim ratnachchhataamanjaree
chitrodanchitakanchukasthagitayorvakshojayoh shobhayaa

हे राधे! नासिका में सोने से जड़ा सुंदर नया मोती पहने, अनेक भंगिमाओं वाली लीला-तरंगों की माला, आप रत्न-जड़ित कंचुकी की शोभा से ब्रज-मणि को मोहित कीजिए।

अप्रेक्षे कृतनिश्चयापि सुचिरं वीक्षेत दृक्कोणतो
मौने दार्ढ्यमुपाश्रितापि निगदेत्तामेव याहीत्यहो ।
अस्पर्शे सुधृताशयापि करयोर्धृत्वा बहिर्यापये
द्राधाया इति मानदुःस्थितिमहं प्रेक्षे हसन्ती कदा ॥ २३० ॥ (230)

aprekshe kritanishchayaapi suchiram veeksheta drikkonato
maune daardhyamupaashritaapi nigadettaameva yaaheetyaho
asparshe sudhritaashayaapi karayordhritvaa bahiryaapaye
draadhaayaa iti maanaduhsthitimaham prekshe hasantee kadaa

न देखने का निश्चय करके भी देर तक नेत्र-कोण से देखती रहती हैं, मौन ठानकर भी "उसी के पास जाओ" कह देती हैं, स्पर्श न करने का संकल्प करके भी हाथ पकड़कर बाहर निकालती हैं; श्रीराधा के मान की यह दशा मैं हँसते हुए कब देखूँगी?

रसागाधे राधाहृदि सरसि हंसः करतले
लसद्वंशस्रोतस्यमृतगुणसङ्गः प्रतिपदम् ।
चलत्पिच्छोत्तंसः सुरचितवतंसः प्रमदया
स्फुरद्गुञ्जागुच्छः स हि रसिकमौलिर्मिलतु माम् ॥ २३१ ॥ (231)

rasaagaadhe raadhaahridi sarasi hamsah karatale
lasadvamshasrotasyamritagunasangah pratipadam
chalatpichchhottamsah surachitavatamsah pramadayaa
sphuradgunjaaguchchhah sa hi rasikamaulirmilatu maam

जो श्रीराधा के रस-भरे हृदय-सरोवर के हंस हैं, जिनके हाथ की बाँसुरी से हर पद पर अमृत झरता है, जिनके सिर पर हिलता मोर-पंख, कानों में सुंदर कुंडल और गले में गुंजा-माला है, वे रसिक-शिरोमणि मुझे मिलें।

अकस्मात्कस्याश्चिन्नववसनमाकर्षति परां
मुरल्या धम्मिल्ले स्पृशति कुरुतेऽन्याकरधृतिम् ।
पतन्नित्यं राधापदकमलमूले व्रजपुरे
तदित्थं वीथीषु भ्रमति स महालम्पटमणिः ॥ २३२ ॥ (232)

akasmaatkasyaashchinnavavasanamaakarshati paraam
muralyaa dhammille sprishati kurute'nyaakaradhritim
patannityam raadhaapadakamalamoole vrajapure
tadittham veetheeshu bhramati sa mahaalampatamanih

वे अचानक किसी गोपी का नया वस्त्र खींचते हैं, किसी के केशों को बाँसुरी से छूते हैं, किसी का हाथ पकड़ लेते हैं, पर सदा श्रीराधा के चरण-कमलों में ही गिरे रहते हैं; ऐसे वे महा-लम्पट-मणि ब्रज की गलियों में घूमते हैं।

एकस्या रतिचौर एव चकितं चान्यास्तनान्ते करं
कृत्वा कर्षति वेणुनान्यसुदृशो धम्मिल्लमल्लीस्रजम् ।
धत्तेऽन्याभुजवल्लिमुत्पुलकितां सङ्केतयत्यन्यया
राधायाः पदयोर्लुठत्यलममुं जाने महालम्पटम् ॥ २३३ ॥ (233)

ekasyaa ratichaura eva chakitam chaanyaastanaante karam
kritvaa karshati venunaanyasudrisho dhammillamalleesrajam
dhatte'nyaabhujavallimutpulakitaam sanketayatyanyayaa
raadhaayaah padayorluthatyalamamum jaane mahaalampatam

सखी हँसकर कहती है: यह किसी से छेड़छाड़ करता है, किसी की माला खींचता है, किसी का हाथ पकड़ता है, पर श्रीराधा के चरणों में ही लोटता है। "मैं इस महा-लम्पट को खूब जानती हूँ।"

प्रियांसे निक्षिप्तोत्पुलकभुजदण्डः क्वचिदपि
भ्रमन्वृन्दारण्ये मदकलकरीन्द्राद्भुतगतिः ।
निजां व्यञ्जन्नत्यद्भुतसुरतशिक्षां क्वचिदहो
रहःकुञ्जे गुञ्जाध्वनितमधुपे क्रीडति हरिः ॥ २३४ ॥ (234)

priyaamse nikshiptotpulakabhujadandah kvachidapi
bhramanvrindaaranye madakalakareendraadbhutagatih
nijaam vyanjannatyadbhutasuratashikshaam kvachidaho
rahahkunje gunjaadhvanitamadhupe kreedati harih

कभी प्रियतमा के कंधे पर पुलकित भुजा रखकर मदमस्त गजराज जैसी अद्भुत चाल से वृंदावन में घूमते हैं, कभी भौंरों से गुंजित एकांत कुञ्ज में क्रीड़ा करते हैं, ऐसे हरि विहार करते हैं।

दूरे सृष्ट्यादिवार्ता न कलयति मनाङ्नारदादीन्स्वभक्ता
ञ्छ्रीदामाद्यैः सुहृद्भिर्न मिलति हरति स्नेहवृद्धिं स्वपित्रोः ।
किन्तु प्रेमैकसीमां परमरससुधासिन्धुसारैरगाधां
श्रीराधामेव जानन्मधुपतिरनिशं कुञ्जवीथीमुपास्ते ॥ २३५ ॥ (235)

doore srishtyaadivaartaa na kalayati manaannaaradaadeensvabhaktaa
nchhreedaamaadyaih suhridbhirna milati harati snehavriddhim svapitroh
kintu premaikaseemaam paramarasasudhaasindhusaarairagaadhaam
shreeraadhaameva jaananmadhupatiranisham kunjaveetheemupaaste

श्यामसुंदर सृष्टि आदि की चर्चा दूर रखते हैं, नारद आदि भक्तों का विचार नहीं करते, श्रीदामा आदि सखाओं से नहीं मिलते और माता-पिता के स्नेह की भी परवाह नहीं करते; केवल श्रीराधा को प्रेम की एकमात्र सीमा जानकर दिन-रात कुञ्ज-गलियों में रहते हैं।

सुस्वादुसुरसतुन्दिल
मिन्दीवरवृन्दसुन्दरं किमपि ।
अधिवृन्दाटवि नन्दति
राधावक्षोजभूषणं ज्योतिः ॥ २३६ ॥ (236)

susvaadusurasatundila
mindeevaravrindasundaram kimapi
adhivrindaatavi nandati
raadhaavakshojabhooshanam jyotih

नील-कमलों के समूह जैसी सुंदर, सुस्वादु रस से पुष्ट, श्रीराधा के वक्ष की आभूषण-रूप कोई ज्योति वृंदावन में आनंदित हो रही है।

कान्तिः कापि परोज्ज्वला नवमिलच्छ्रीचन्द्रिकोद्भासिनी
रामाद्यद्भुतवर्णकाञ्चिद्रुचिर्नित्याधिकाङ्गच्छविः ।
लज्जानम्रतनुः स्मयेन मधुरा प्रीणाति केलिच्छटा
सन्मुक्ताफलचारुहारसुरुचिः स्वात्मार्पणेनाच्युतम् ॥ २३७ ॥ (237)

kaantih kaapi parojjvalaa navamilachchhreechandrikodbhaasinee
raamaadyadbhutavarnakaanchidruchirnityaadhikaangachchhavih
lajjaanamratanuh smayena madhuraa preenaati kelichchhataa
sanmuktaaphalachaaruhaarasuruchih svaatmaarpanenaachyutam

नई चाँदनी जैसी उज्ज्वल, अद्भुत सखियों के बीच मणि-सी, नित्य बढ़ती अंग-छवि वाली, लज्जा से झुकी और मुसकान से मधुर, मोतियों के हार से सजी वे अपने आत्म-समर्पण से अच्युत को प्रसन्न करती हैं।

यन्नारदाजेशशुकैरगम्यं
वृन्दावने वञ्जुलमञ्जुकुञ्जे ।
तत्कृष्णचेतोहरणैकविज्ञ
मत्रास्ति किञ्चित्परमं रहस्यम् ॥ २३८ ॥ (238)

yannaaradaajeshashukairagamyam
vrindaavane vanjulamanjukunje
tatkrishnachetoharanaikavijna
matraasti kinchitparamam rahasyam

वृंदावन के सुंदर वेतस-कुञ्ज में एक परम रहस्य है, जो नारद, ब्रह्मा, शिव और शुकदेव को भी अगम्य है, और जो अकेला ही श्रीकृष्ण का चित्त चुराने में समर्थ है।

लक्ष्म्याश्च न गोचरी भवति यन्नापुः सखायः प्रभोः
सम्भाव्योऽपि विरिञ्चिनारदशिवस्वायम्भुवाद्यैर्न यः ।
यो वृन्दावननागरीपशुपतिस्त्रीभावलभ्यः कथं
राधामाधवयोर्ममास्तु स रहोदास्याधिकारोत्सवः ॥ २३९ ॥ (239)

lakshmyaashcha na gocharee bhavati yannaapuh sakhaayah prabhoh
sambhaavyo'pi virinchinaaradashivasvaayambhuvaadyairna yah
yo vrindaavananaagareepashupatistreebhaavalabhyah katham
raadhaamaadhavayormamaastu sa rahodaasyaadhikaarotsavah

जो लक्ष्मी को भी दिखाई नहीं देता, प्रभु के सखा भी जिसे नहीं पाते, ब्रह्मा, नारद, शिव आदि जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, और जो केवल वृंदावन की गोपियों के भाव से ही मिलता है, राधा-माधव का वह रहस्य-दास्य मुझे मिले।

उच्छिष्टामृतभुक्तवैव चरितं शृण्वंस्तवैव स्मर
न्पादाम्भोजरजस्तवैव विचरन्कुञ्जांस्तवैवालयान् ।
गायन्दिव्यगुणांस्तवैव रसदे पश्यंस्तवैवाकृतिं
श्रीराधे तनुवाङ्मनोभिरमलैः सोऽहं तवैवाश्रितः ॥ २४० ॥ (240)

uchchhishtaamritabhuktavaiva charitam shrinvamstavaiva smara
npaadaambhojarajastavaiva vicharankunjaamstavaivaalayaan
gaayandivyagunaamstavaiva rasade pashyamstavaivaakritim
shreeraadhe tanuvaanmanobhiramalaih so'ham tavaivaashritah

हे रस देने वाली श्रीराधे! आपका ही उच्छिष्ट पाती, आपके ही चरित्र सुनती और स्मरण करती, आपके ही कुञ्जों में विचरती, आपके ही गुण गाती और आपका ही रूप देखती, शुद्ध तन, वचन और मन से मैं केवल आपकी ही आश्रिता हूँ।

क्रीडन्मीनद्वयाक्ष्याः स्फुरदधरमणीविद्रुमश्रोणिभार
द्वीपायामोन्तरालस्मरकलभकटाटोपवक्षोरुहायाः ।
गम्भीरावर्तनाभेर्बहुलहरिमहाप्रेमपीयूषसिन्धोः
श्रीराधायाः पदाम्भोरुहपरिचरणे योग्यतामेव चिन्वे ॥ २४१ ॥ (241)

kreedanmeenadvayaakshyaah sphuradadharamaneevidrumashronibhaara
dveepaayaamontaraalasmarakalabhakataatopavakshoruhaayaah
gambheeraavartanaabherbahulaharimahaapremapeeyooshasindhoh
shreeraadhaayaah padaambhoruhaparicharane yogyataameva chinve

शास्त्रीय काव्य की भाषा में सखी श्रीराधा को हरि के महाप्रेम का सागर बताती है और केवल उनके चरण-कमलों की सेवा की योग्यता चाहती है।

मालाग्रन्थनशिक्षया मृदुमृदुश्रीखण्डनिर्घर्षणा
देशेनाद्भुतमोदकादिविधिभिः कुञ्जान्तसम्मार्जनैः ।
वृन्दारण्यरहःस्थलीषु विवशा प्रेमार्तिभारोद्गमा
त्प्राणेशं परिचारिकैः खलु कदा दास्या मयाधीश्वरी ॥ २४२ ॥ (242)

maalaagranthanashikshayaa mridumridushreekhandanirgharshanaa
deshenaadbhutamodakaadividhibhih kunjaantasammaarjanaih
vrindaaranyarahahsthaleeshu vivashaa premaartibhaarodgamaa
tpraanesham parichaarikaih khalu kadaa daasyaa mayaadheeshvaree

माला गूँथना सिखाकर, धीरे-धीरे चंदन घिसने का आदेश देकर, अद्भुत मिठाइयाँ बनाने और कुञ्ज बुहारने की आज्ञा देकर, प्रियतम के प्रेम में विवश मेरी स्वामिनी मुझे दासी के रूप में कब स्वीकार करेंगी?

प्रेमाम्भोधिरसोल्लसत्तरुणिमारम्भेण गम्भीरदृग्
भेदाभङ्गिमृदुस्मितामृतनवज्योत्स्नाञ्चितश्रीमुखी ।
श्रीराधा सुखधामनि प्रविलसद्वृन्दाटवीसीमनि
प्रेयोऽङ्के रतिकौतुकानि कुरुते कन्दर्पलीलानिधिः ॥ २४३ ॥ (243)

premaambhodhirasollasattarunimaarambhena gambheeradrig
bhedaabhangimridusmitaamritanavajyotsnaanchitashreemukhee
shreeraadhaa sukhadhaamani pravilasadvrindaataveeseemani
preyo'nke ratikautukaani kurute kandarpaleelaanidhih

प्रेम-सागर के उल्लास की तरुणाई से जिनकी दृष्टि गम्भीर हो रही है और जिनका मुख मृदु मुसकान की चाँदनी से शोभित है, वे कन्दर्प-लीला-निधि श्रीराधा वृंदावन के सुख-धाम कुञ्ज में प्रियतम के अंक में आनंद करती हैं।

शुद्धप्रेमविलासवैभवनिधिः कैशोरशोभानिधि
र्वैदग्धीमधुराङ्गभङ्गिमनिधिर्लावण्यसम्पन्निधिः ।
श्रीराधा जयतान्महारसनिधिः कन्दर्पलीलानिधिः
सौन्दर्यैकसुधानिधिर्मधुपतेः सर्वस्वभूतो निधिः ॥ २४४ ॥ (244)

shuddhapremavilaasavaibhavanidhih kaishorashobhaanidhi
rvaidagdheemadhuraangabhangimanidhirlaavanyasampannidhih
shreeraadhaa jayataanmahaarasanidhih kandarpaleelaanidhih
saundaryaikasudhaanidhirmadhupateh sarvasvabhooto nidhih

शुद्ध प्रेम-विलास की निधि, कैशोर-शोभा की निधि, चतुर मधुर भंगिमा की निधि, लावण्य की निधि, महारस की निधि, कन्दर्प-लीला की निधि, सौंदर्य-सुधा की निधि और मधुपति का सर्वस्व, उन श्रीराधा की जय हो।

नीलेन्दीवरवृन्दकान्तिलहरीचौरं किशोरद्वयं
त्वय्ये तत्कुचयोश्चकास्ति किमिदं रूपेण सम्मोहनम् ।
तन्मामात्मसखीं कुरु द्वितरुणीयं नौ दृढं श्लिष्यति
स्वच्छायामभिवीक्ष्य मुह्यति हरौ राधास्मितं पातु नः ॥ २४५ ॥ (245)

neelendeevaravrindakaantilahareechauram kishoradvayam
tvayye tatkuchayoshchakaasti kimidam roopena sammohanam
tanmaamaatmasakheem kuru dvitaruneeyam nau dridham shlishyati
svachchhaayaamabhiveekshya muhyati harau raadhaasmitam paatu nah

श्रीराधा में अपनी ही परछाईं देखकर मोहित हुए श्रीकृष्ण विनोद से उनकी सखी बनने की इच्छा करते हैं। हरि के इस मोह पर प्रकट हुई श्रीराधा की मंद मुसकान हमारी रक्षा करे।

सङ्गत्यापि महोत्सवेन मधुराकारां हृदि प्रेयसः
स्वच्छायामभिवीक्ष्य कौस्तुभमणौ सम्भूतशोकक्रुधः ।
उत्क्षिप्य प्रियपाणिमेव विनयेत्युक्त्वा गताया बहिः
सख्यै सास्रनिवेदितानि किमहं श्रोष्यामि ते राधिके ॥ २४६ ॥ (246)

sangatyaapi mahotsavena madhuraakaaraam hridi preyasah
svachchhaayaamabhiveekshya kaustubhamanau sambhootashokakrudhah
utkshipya priyapaanimeva vinayetyuktvaa gataayaa bahih
sakhyai saasraniveditaani kimaham shroshyaami te raadhike

प्रियतम के हृदय की कौस्तुभ-मणि में अपनी ही मधुर परछाईं देखकर उत्पन्न ईर्ष्या और दुःख से उनका हाथ हटाकर "अविनय" कहकर बाहर चली गई आप, हे राधिके, क्या मैं सखी से कहे आपके आँसू-भरे वचन सुनूँगी?

महामणिवरस्रजं कुसुमसञ्चयैरञ्चितं
महामरकतप्रभाग्रथितमोहितश्यामलम् ।
महारसमहीपतेरिव विचित्रसिद्धासनं
कदा नु तव राधिके कबरभारमालोकये ॥ २४७ ॥ (247)

mahaamanivarasrajam kusumasanchayairanchitam
mahaamarakataprabhaagrathitamohitashyaamalam
mahaarasamaheepateriva vichitrasiddhaasanam
kadaa nu tava raadhike kabarabhaaramaalokaye

हे श्रीराधिके! जो श्रेष्ठ मणियों की माला और फूलों से सजी है, जिसकी श्यामलता मरकत-मणि की प्रभा को भी मोहित करती है, और जो रसराज का मानो सिंहासन है, आपकी उस वेणी को मैं कब देखूँगी?

मध्ये मध्ये कुसुमखचितं रत्नदाम्ना निबद्धं
मल्लीमाल्यैर्घनपरिमलैर्भूषितं लम्बमानैः ।
पश्चाद्राजन्मणिवरकृतोदारमाणिक्यगुच्छं
धम्मिल्लं ते हरिकरधृतं कर्हि पश्यामि राधे ॥ २४८ ॥ (248)

madhye madhye kusumakhachitam ratnadaamnaa nibaddham
malleemaalyairghanaparimalairbhooshitam lambamaanaih
pashchaadraajanmanivarakritodaaramaanikyaguchchham
dhammillam te harikaradhritam karhi pashyaami raadhe

बीच-बीच में फूलों से गुँथी, रत्नों की डोरी से बँधी, सुगंधित लटकती मल्लिका की मालाओं से सजी, पीछे माणिक्य-गुच्छ से शोभित, श्रीहरि के हाथों सँवारी आपकी वेणी को, हे राधे, मैं कब देखूँगी?

विचित्राभिर्भङ्गीविततिभिरहो चेतसि परं
चमत्कारं यच्छंल्ललितमणिमुक्तादिललितः ।
रसावेशाद्वित्तः स्मरमधुरवृत्ताखिलमहो
द्भुतस्ते सीमन्ते नवकनकपट्टो विजयते ॥ २४९ ॥ (249)

vichitraabhirbhangeevitatibhiraho chetasi param
chamatkaaram yachchhamllalitamanimuktaadilalitah
rasaaveshaadvittah smaramadhuravrittaakhilamaho
dbhutaste seemante navakanakapatto vijayate

आपकी माँग में सजा नया सुनहरा पट्ट, मणि-मोतियों से जड़ा, अपनी अनेक भंगिमाओं से मन को परम चमत्कार और आनंद देता है; उसकी जय हो।

अहो द्वैधीकर्तुं कृतिभिरनुरागामृतरस
प्रवाहैः सुस्निग्धैः कुटिलरुचिरश्याम उचितः ।
इतीयं सीमन्ते नवरुचिरसिन्दूररचिता
सुरेखा नः प्रख्यापयितुमिव राधे विजयते ॥ २५० ॥ (250)

aho dvaidheekartum kritibhiranuraagaamritarasa
pravaahaih susnigdhaih kutilaruchirashyaama uchitah
iteeyam seemante navaruchirasindoorarachitaa
surekhaa nah prakhyaapayitumiva raadhe vijayate

हे राधे! आपकी माँग में नई सुंदर सिंदूर-रेखा मानो हमें यह बताने के लिए सुशोभित है कि अनुराग-रस के प्रवाह से उस घुँघराले श्याम को दो भागों में बाँटना ही उचित है।

चकोरस्ते वक्त्रामृतकिरणबिम्बे मधुकर
स्तव श्रीपादाब्जे जघनपुलिने खञ्जनवरः ।
स्फुरन्मीनो जातस्त्वयि रससरस्यां मधुपतेः
सुखाटव्यां राधे त्वयि च हरिणस्तस्य नयनम् ॥ २५१ ॥ (251)

chakoraste vaktraamritakiranabimbe madhukara
stava shreepaadaabje jaghanapuline khanjanavarah
sphuranmeeno jaatastvayi rasasarasyaam madhupateh
sukhaatavyaam raadhe tvayi cha harinastasya nayanam

हे श्रीराधे! मधुपति के नेत्र आपके मुख-चन्द्र के चकोर, चरण-कमलों के भौंरे, तट के खंजन, आपके रस-सरोवर की मछलियाँ और आपके सुख-वन के हिरण बन गए हैं।

स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा मृदुकरतलेनाङ्गमङ्गं सुशीतं
सान्द्रानन्दामृतरसह्रदे मज्जतो माधवस्य ।
अङ्के पङ्केरुहसुनयना प्रेममूर्तिः स्फुरन्ती
गाढाश्लेषोन्नमितचिबुका चुम्बिता पातु राधा ॥ २५२ ॥ (252)

sprishtvaa sprishtvaa mridukaratalenaangamangam susheetam
saandraanandaamritarasahrade majjato maadhavasya
anke pankeruhasunayanaa premamoortih sphurantee
gaadhaashleshonnamitachibukaa chumbitaa paatu raadhaa

जिनके शीतल अंगों को बार-बार अपने कोमल हाथों से छूकर माधव घने आनंद-रस के सरोवर में डूब जाते हैं, प्रियतम के अंक में शोभित वे कमल-नयनी प्रेम-मूर्ति श्रीराधा हमारी रक्षा करें।

सदा गायं गायं मधुरतरराधाप्रिययशः
सदा सान्द्रानन्दा नवरसदराधापतिकथाः ।
सदा स्थायं स्थायं नवनिभृतराधारतिवने
सदा ध्यायं ध्यायं विवशहृदि राधापदसुधाः ॥ २५३ ॥ (253)

sadaa gaayam gaayam madhuratararaadhaapriyayashah
sadaa saandraanandaa navarasadaraadhaapatikathaah
sadaa sthaayam sthaayam navanibhritaraadhaarativane
sadaa dhyaayam dhyaayam vivashahridi raadhaapadasudhaah

सदा श्रीराधा के मधुर प्रिय यश को गाती, सदा श्रीराधापति की आनंद-भरी कथाएँ कहती, सदा श्रीराधा के एकांत केलि-वन में रहती, और सदा श्रीराधा-पद-सुधा का ध्यान करती, मेरा हृदय कब विवश होगा?

श्याम श्यामेत्यमृतरससंस्रावि वर्णाञ्जपन्ती
प्रेमौत्कण्ठ्यात्क्षणमपि सरोमाञ्चमुच्चैर्लपन्ती ।
सर्वत्रोच्चाटनमिव गता दुःखदुःखेन पारं
काङ्क्षत्यह्नो दिनकरमलं क्रुध्यती पातु राधा ॥ २५४ ॥ (254)

shyaama shyaametyamritarasasamsraavi varnaanjapantee
premautkanthyaatkshanamapi saromaanchamuchchairlapantee
sarvatrochchaatanamiva gataa duhkhaduhkhena paaram
kaankshatyahno dinakaramalam krudhyatee paatu raadhaa

अमृत-रस बहाने वाले "श्याम, श्याम" अक्षरों का जप करती, प्रेम की उत्कंठा से पुलकित होकर ऊँचे स्वर में पुकारती, सब ओर से अशांत, बड़े दुःख से दिन काटती और सूर्य पर क्रोध करती श्रीराधा हमारी रक्षा करें।

कदाचिद्गायन्ती प्रियरतिकलावैभवगतिं
कदाचिद्ध्यायन्ती प्रियसहभविष्यद्विलसितम् ।
अलं मुञ्चामुञ्चेत्यतिमधुरमुग्धप्रलपितै
र्नयन्ती श्रीराधा दिनमिह कदा नन्दयतु नः ॥ २५५ ॥ (255)

kadaachidgaayantee priyaratikalaavaibhavagatim
kadaachiddhyaayantee priyasahabhavishyadvilasitam
alam munchaamunchetyatimadhuramugdhapralapitai
rnayantee shreeraadhaa dinamiha kadaa nandayatu nah

कभी प्रियतम की केलि-कला का गान करती, कभी उनके साथ होने वाले विलास का ध्यान करती, कभी "छोड़ो, छोड़ो, बस" ऐसा मधुर प्रलाप करती, दिन बिताने वाली श्रीराधा हमें कब आनंदित करेंगी?

श्रीगोविन्द व्रजवरवधूवृन्दचूडामणिस्ते
कोटिप्राणाभ्यधिकपरमप्रेष्ठपादाब्जलक्ष्मीः ।
कैङ्कर्येणाद्भुतनवरसेनैव मां स्वीकरोतु
भूयो भूयः प्रतिमुहुरधिस्वामि सम्प्रार्थयेऽहम् ॥ २५६ ॥ (256)

shreegovinda vrajavaravadhoovrindachoodaamaniste
kotipraanaabhyadhikaparamapreshthapaadaabjalakshmeeh
kainkaryenaadbhutanavarasenaiva maam sveekarotu
bhooyo bhooyah pratimuhuradhisvaami sampraarthaye'ham

हे श्रीगोविन्द! ब्रज-वधुओं की चूड़ामणि, जिनकी चरण-शोभा आपको करोड़ों प्राणों से भी प्यारी है, वे मुझे अपने अद्भुत नवरस भरे कैंकर्य में स्वीकार करें; हे स्वामी, यही मैं आपसे बार-बार प्रार्थना करती हूँ।

अनेन प्रीता मे दिशतु निजकैङ्कर्यपदवीं
दवीयो दृष्टीनां पदमहह राधा सुखमयी ।
निधायैवं चित्ते कुवलयरुचिं बर्हमुकुटं
किशोरं ध्यायामि द्रुतकनकपीतच्छविपटम् ॥ २५७ ॥ (257)

anena preetaa me dishatu nijakainkaryapadaveem
daveeyo drishteenaam padamahaha raadhaa sukhamayee
nidhaayaivam chitte kuvalayaruchim barhamukutam
kishoram dhyaayaami drutakanakapeetachchhavipatam

नील-कमल की कांति वाले, मोर-मुकुटधारी, पिघले सोने जैसे पीताम्बर वाले किशोर श्रीकृष्ण को हृदय में धारण कर मैं उनका ध्यान करती हूँ, जिससे प्रसन्न होकर सुखमयी श्रीराधा मुझे अपनी सेवा-पदवी दें।

ध्यायंस्तं शिखिपिच्छमौलिमनिशं तन्नामसङ्कीर्तय
न्नित्यं तच्चरणाम्बुजं परिचरंस्तन्मन्त्रवर्यं जपन् ।
श्रीराधापददास्यमेव परमाभीष्टं हृदा धारयन्
कर्हि स्यां तदनुग्रहेण परमोद्भूतानुरागोत्सवः ॥ २५८ ॥ (258)

dhyaayamstam shikhipichchhamaulimanisham tannaamasankeertaya
nnityam tachcharanaambujam paricharamstanmantravaryam japan
shreeraadhaapadadaasyameva paramaabheeshtam hridaa dhaarayan
karhi syaam tadanugrahena paramodbhootaanuraagotsavah

मोर-पंख वाले श्रीकृष्ण का निरंतर ध्यान करती, उनका नाम-कीर्तन करती, उनके चरणों की सेवा करती, उनका मंत्र जपती और श्रीराधा-चरणों के दास्य को ही परम अभीष्ट मानकर हृदय में रखती, मैं उनकी कृपा से कब प्रेमोत्सव में डूबूँगी?

श्रीराधारसिकेन्द्ररूपगुणवद्गीतानि संश्रावयन्
गुञ्जामञ्जुलहारबर्हमुकुटाद्यावेदयंश्चाग्रतः ।
श्यामप्रेषितपूगमाल्यनवगन्धाद्यैश्च संप्रीणयं
स्त्वत्पादाब्जनखच्छटारसह्रदे मग्नः कदा स्यामहम् ॥ २५९ ॥ (259)

shreeraadhaarasikendraroopagunavadgeetaani samshraavayan
gunjaamanjulahaarabarhamukutaadyaavedayamshchaagratah
shyaamapreshitapoogamaalyanavagandhaadyaishcha sampreenayam
stvatpaadaabjanakhachchhataarasahrade magnah kadaa syaamaham

श्रीराधा और रसिकेन्द्र के रूप-गुणों के गीत सुनाती, गुंजा-माला और मोर-मुकुट भेंट करती, श्याम द्वारा भेजे पान, माला और सुगंध से आपको प्रसन्न करती, मैं आपके चरण-नखों की छटा के रस-सरोवर में कब डूबूँगी?

क्वासौ राधा निगमपदवीदूरगा कुत्र चासौ
कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरैकान्तवासः ।
क्वाहं तुच्छः परममधमः प्राण्यहो गर्ह्यकर्मा
यत्तन्नाम स्फुरति महिमा एष वृन्दावनस्य ॥ २६० ॥ (260)

kvaasau raadhaa nigamapadaveedooragaa kutra chaasau
krishnastasyaah kuchakamalayorantaraikaantavaasah
kvaaham tuchchhah paramamadhamah praanyaho garhyakarmaa
yattannaama sphurati mahimaa esha vrindaavanasya

कहाँ वेदों से भी दूर श्रीराधा, कहाँ उनके हृदय में एकांत वास करने वाले श्रीकृष्ण, और कहाँ मैं तुच्छ, अधम प्राणी? फिर भी जो उनका नाम मुझमें स्फुरित होता है, वह वृंदावन की ही महिमा है।

वृन्दारण्ये नवरसकलाकोमलप्रेममूर्तेः
श्रीराधायाश्चरणकमलामोदमाधुर्यसीमा ।
राधां ध्यायन्रसिकतिलकेनात्तकेलीविलासां
तामेवाहं कथमिह तनुं न्यस्य दासी भवेयम् ॥ २६१ ॥ (261)

vrindaaranye navarasakalaakomalapremamoorteh
shreeraadhaayaashcharanakamalaamodamaadhuryaseemaa
raadhaam dhyaayanrasikatilakenaattakeleevilaasaam
taamevaaham kathamiha tanum nyasya daasee bhaveyam

रसिक-तिलक के साथ केलि करने वाली, नवरस-कला की कोमल प्रेम-मूर्ति श्रीराधा का ध्यान करती हुई, मैं इस वृंदावन में शरीर त्यागकर उनके चरण-कमलों की सुगंध की सीमा-रूप दासी कैसे बनूँगी?

हा कालिन्दि त्वयि मम निधिः प्रेयसा क्षालितो भू
द्भो भो दिव्याद्भुततरुलतास्त्वत्करस्पर्शभाजः ।
हे राधायाः रतिगृहशुका हे मृगा हे मयूराः
भूयो भूयः प्रणतिभिरहं प्रार्थये वोऽनुकम्पाम् ॥ २६२ ॥ (262)

haa kaalindi tvayi mama nidhih preyasaa kshaalito bhoo
dbho bho divyaadbhutatarulataastvatkarasparshabhaajah
he raadhaayaah ratigrihashukaa he mrigaa he mayooraah
bhooyo bhooyah pranatibhiraham praarthaye vo'nukampaam

हे कालिन्दी! प्रियतम ने आपमें मेरी निधि-रूप स्वामिनी के साथ जल-विहार किया है; हे दिव्य तरु-लताओ, आपने उनके कर-स्पर्श पाए हैं; हे श्रीराधा-रति-गृह के तोतो, हिरणो, मोरो! मैं बार-बार प्रणाम करके आपसे कृपा माँगती हूँ।

वहन्ती राधायाः कुचकलशकाश्मीरजमहो
जलक्रीडावेशाद्गलितमतुलप्रेमरसदम् ।
इयं सा कालिन्दी विकसितनवेन्दीवररुचि
स्सदा मन्दीभूतं हृदयमिह सन्दीपयतु मे ॥ २६३ ॥ (263)

vahantee raadhaayaah kuchakalashakaashmeerajamaho
jalakreedaaveshaadgalitamatulapremarasadam
iyam saa kaalindee vikasitanavendeevararuchi
ssadaa mandeebhootam hridayamiha sandeepayatu me

जल-क्रीड़ा के आवेश में श्रीराधा से छूटी प्रेम-रस-दायिनी केसर को बहाने वाली, खिले नील-कमल जैसी शोभा वाली कालिंदी यमुना मेरे मंद पड़े हृदय को सदा प्रकाशित करें।

सद्योगीन्द्रसुदृश्यसान्द्ररसदानन्दैकसन्मूर्तयः
सर्वेऽप्यद्भुतसन्महिम्नि मधुरे वृन्दावने सङ्गताः ।
ये क्रूरा अपि पापिनो न च सतां सम्भाष्यदृश्याश्च ये
सर्वान्वस्तुतया निरीक्ष्य परमस्वाराध्यबुद्धिर्मम ॥ २६४ ॥ (264)

sadyogeendrasudrishyasaandrarasadaanandaikasanmoortayah
sarve'pyadbhutasanmahimni madhure vrindaavane sangataah
ye krooraa api paapino na cha sataam sambhaashyadrishyaashcha ye
sarvaanvastutayaa nireekshya paramasvaaraadhyabuddhirmama

अद्भुत महिमा वाले मधुर वृंदावन से जिनका संबंध है, वे भले ही क्रूर, पापी या सज्जनों से बात करने योग्य न लगें, वास्तव में सब योगीन्द्रों के देखने योग्य आनंद-मूर्ति हैं; उन्हें वास्तविक रूप में देखकर उनमें मेरी परम आराध्य-बुद्धि है।

यद्राधापदकिङ्करीकृतहृदां सम्यग्भवेद्गोचरं
ध्येयं नैव कदापि यद्धृदि विना तस्याः कृपास्पर्शतः ।
यत्प्रेमामृतसिन्धुसाररसदं पापैकभाजामपि
तद्वृन्दावनदुष्प्रवेशमहिमाश्चर्यं हृदि स्फूर्जतु ॥ २६५ ॥ (265)

yadraadhaapadakinkareekritahridaam samyagbhavedgocharam
dhyeyam naiva kadaapi yaddhridi vinaa tasyaah kripaasparshatah
yatpremaamritasindhusaararasadam paapaikabhaajaamapi
tadvrindaavanadushpraveshamahimaashcharyam hridi sphoorjatu

जो केवल श्रीराधा-चरणों में किंकरी-भाव वाले हृदयों को ही ठीक से दिखता है, जो उनकी कृपा के स्पर्श के बिना कभी ध्यान में नहीं आता, और जो पापियों को भी प्रेमामृत-सागर का सार देता है, वृंदावन की वह दुष्प्रवेश आश्चर्यमयी महिमा मेरे हृदय में स्फुरित हो।

राधाकेलिकलासु साक्षिणि कदा वृन्दावने पावने
वत्स्यामि स्फुटमुज्ज्वलाद्भुतरसे प्रेमैकमत्ताकृतिः ।
तेजोरूपनिकुञ्ज एव कलयन्नेत्रादिपिण्डस्थितं
तादृक्स्वोचितदिव्यकोमलवपुः स्वीयं समालोकये ॥ २६६ ॥ (266)

raadhaakelikalaasu saakshini kadaa vrindaavane paavane
vatsyaami sphutamujjvalaadbhutarase premaikamattaakritih
tejoroopanikunja eva kalayannetraadipindasthitam
taadriksvochitadivyakomalavapuh sveeyam samaalokaye

मैं कब प्रेम में मतवाली होकर श्रीराधा-केलि के साक्षी, उज्ज्वल अद्भुत रस से भरे पवित्र वृंदावन में रहूँगी, और तेजोमय निकुञ्ज की भावना करती हुई उसके योग्य अपने कोमल दिव्य शरीर को कब देखूँगी?

यत्र यत्र मम जन्म कर्मभि
र्नारकेऽथ परमे पदेऽथवा ।
राधिकारतिनिकुञ्जमण्डली
तत्र तत्र हृदि मे विराजताम् ॥ २६७ ॥ (267)

yatra yatra mama janma karmabhi
rnaarake'tha parame pade'thavaa
raadhikaaratinikunjamandalee
tatra tatra hridi me viraajataam

कर्मवश नरक में या परम धाम में जहाँ-जहाँ मेरा जन्म हो, वहाँ-वहाँ श्रीराधा की केलि-कुञ्ज-मंडली मेरे हृदय में विराजमान रहे।

क्वाहं मूढमतिः क्व नाम परमानन्दैकसारं रसः
श्रीराधाचरणानुभावकथया निस्यन्दमाना गिरः ।
लग्नाः कोमलकुञ्जपुञ्जविलसद्वृन्दाटवीमण्डले
क्रीडच्छ्रीवृषभानुजापदनखज्योतिश्छटाः प्रायशः ॥ २६८ ॥ (268)

kvaaham moodhamatih kva naama paramaanandaikasaaram rasah
shreeraadhaacharanaanubhaavakathayaa nisyandamaanaa girah
lagnaah komalakunjapunjavilasadvrindaataveemandale
kreedachchhreevrishabhaanujaapadanakhajyotishchhataah praayashah

कहाँ मैं मूढ़मति, और कहाँ परमानंद का सार वह रस? फिर भी श्रीराधा-चरणों की महिमा कहने से बहती मेरी वाणी, कोमल कुञ्जों वाले वृंदावन में क्रीड़ा करती वृषभानु-नन्दिनी के चरण-नखों की छटा से भरी है।

श्रीराधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे
स्वस्तोत्रे स्वकृपात एव सहजो योग्योऽप्यहं कारितः ।
पद्येनैव सदापराधिनि महन्मार्गं विरुद्ध्य त्वदे
काशे स्नेहजलाकुलाक्षि किमपि प्रीतिं प्रसादीकुरु ॥ २६९ ॥ (269)

shreeraadhe shrutibhirbudhairbhagavataapyaamrigyasadvaibhave
svastotre svakripaata eva sahajo yogyo'pyaham kaaritah
padyenaiva sadaaparaadhini mahanmaargam viruddhya tvade
kaashe snehajalaakulaakshi kimapi preetim prasaadeekuru

हे श्रीराधे! जिनका वैभव वेद, बुद्धिमान और स्वयं भगवान भी खोजते हैं, आपकी कृपा से ही मैं आपका यह स्तोत्र रचने योग्य बनी। हे स्नेह-जल से भरे नयनों वाली, सदा अपराधी किंतु केवल आपकी आशा रखने वाली मुझ पर अपनी प्रीति का प्रसाद कीजिए।

अद्भुतानन्दलोभश्चे
न्नाम्ना रससुधानिधिः ।
स्तवोऽयं कर्णकलशै
र्गृहीत्वा पीयतां बुधाः ॥ २७० ॥ (270)

adbhutaanandalobhashche
nnaamnaa rasasudhaanidhih
stavo'yam karnakalashai
rgriheetvaa peeyataam budhaah

हे बुद्धिमानो! यदि आपको अद्भुत आनंद का लोभ है, तो "रस-सुधा-निधि" नामक इस स्तव को ग्रहण करके कानों के कलशों से इसका पान कीजिए।

ग्रंथ के बारे में

वृंदावन से श्रीराधा की प्रार्थना

इसकी रचना किसने की

श्री हित हरिवंश महाप्रभु, जिन्होंने सोलहवीं शताब्दी में वृंदावन में राधावल्लभ संप्रदाय की स्थापना की और श्री हित चौरासी की भी रचना की। यह परंपरा उपासना के केंद्र में श्रीराधा को रखती है, और यह स्तुति आरंभ से अंत तक उन्हीं को संबोधित है।

यह क्या माँगती है

धन या मोक्ष नहीं, सेवा: उनके कुंज का आँगन बुहारना, उनकी मालाएँ ले चलना, उनकी वाणी सुनना। कवि श्रीराधा की सखी के भाव से बोलते हैं, जो पूरे राधावल्लभ मार्ग का भाव है।

यह संस्करण

पाठ हमारी अपनी टाइपिंग है, जिसे बाबा हितदास की हिंदी टीका वाले 1950 के संस्करण से श्लोक-श्लोक मिलाया गया है, जो सार्वजनिक डोमेन में है। जहाँ इंटरनेट पर मिलने वाली प्रतियाँ उस संस्करण से भिन्न हैं, वहाँ हम मुद्रित पाठ का पालन करते हैं।

दो नाम, दो परंपराएँ

इसी ग्रंथ को राधा रस सुधानिधि भी कहते हैं। गौड़ीय संस्करण इसे प्रबोधानंद सरस्वती की रचना मानते हैं और श्लोकों की संख्या अलग रखते हैं। यह पृष्ठ राधावल्लभ परंपरा का पालन करता है, जिसमें प्रेमानंद जी महाराज ने दीक्षा ली।

पूरे वृंदावन में गाई जाने वाली श्रीराधा की एक और स्तुति के लिए राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र देखें, और श्री यमुना जी की स्तुति के लिए यमुनाष्टकम्।

साधना के लिए उपयोगी

जो भक्त अक्सर पूछते हैं

राधा कृपा कटाक्ष Stotra, Arth Sahit

राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र, अर्थ सहित

स्तोत्र और उसके हिंदी अर्थ वाली छोटी पाठ पुस्तक, घर के मंदिर में रखने योग्य।

Amazon पर देखें
Tulsi Japa Mala, 108 Beads

तुलसी जप माला, 108 मनके

7 मिमी मनकों वाली सादी तुलसी माला, रोज़ के जप के लिए सबसे सुविधाजनक आकार।

Amazon पर देखें
Brass Lotus Diya, Set of 2

पीतल का कमल दीया, दो का सेट

घर के मंदिर के लिए कमल आकार के दो छोटे पीतल के दीये, दैनिक आरती या दीपदान के लिए।

Amazon पर देखें

Amazon एसोसिएट के रूप में हम योग्य ख़रीद से कमाते हैं; आपकी क़ीमत नहीं बदलती। इनमें से कुछ भी साधना के लिए ज़रूरी नहीं है, और इनका महाराज जी या आश्रम से कोई संबंध नहीं है। सभी वस्तुएँ देखें

Common questions

राधासुधानिधि के बारे में लोग क्या पूछते हैं

ग्रंथ, उसके रचयिता और इस संस्करण पर संक्षिप्त उत्तर।

राधासुधानिधि किसने लिखी?

सोलहवीं शताब्दी में राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने, जिस परंपरा में प्रेमानंद जी महाराज ने दीक्षा ली।

राधासुधानिधि में कितने श्लोक हैं?

राधावल्लभ संस्करण में 270, जिनमें अंतिम फलश्रुति है। सभी 270 श्लोक इस पृष्ठ पर हैं, हर एक मुद्रित संस्करण से मिलाया गया।

क्या यह राधा रस सुधानिधि ही है?

यह वही ग्रंथ है, लंबे नाम से। कुछ संस्करण, विशेषकर गौड़ीय परंपरा में, इसे प्रबोधानंद सरस्वती की रचना मानते हैं और क्रम अलग रखते हैं; यह पृष्ठ राधावल्लभ परंपरा और उसकी क्रम-संख्या का पालन करता है।

इसका विषय क्या है?

यह श्रीराधा से लंबी प्रार्थना है: उनकी कृपा, उनकी चरण-रज, वृंदावन की कुंजों में सेवा, और श्रीकृष्ण के साथ उनके प्रेम की एक झलक की लालसा।

यह पाठ कहाँ से लिया गया है?

हमने इसे स्वयं टाइप किया और हर श्लोक को बाबा हितदास की हिंदी टीका वाले 1950 के राधावल्लभ संस्करण से मिलाया, जो सार्वजनिक डोमेन में है। जहाँ प्रतियों में अंतर है, वहाँ उसी संस्करण का पाठ लिया गया है।

क्या बिना दीक्षा के इसका पाठ कर सकते हैं?

इसे पढ़ने और पाठ करने के लिए न दीक्षा चाहिए, न कोई शुल्क। एक बार अर्थ पढ़ लें ताकि पता हो कि आप क्या कह रहे हैं।

ब्रज के और पाठ

वृंदावन में गाए जाने वाले स्तोत्र और पद, स्वच्छ देवनागरी में, पढ़ने के लिए निःशुल्क।