वृंदावन जिसे अपना गान कहता है — उसका अर्थ, उसके तेरह श्लोक, और पाठ की विधि।
कृपा यानी दया, कटाक्ष यानी तिरछी चितवन। पूरा स्तोत्र श्री राधा से यही एक दृष्टि माँगता है, और कुछ नहीं।
कदा करिष्यसीह मां
कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥
“कब मुझे अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाओगी?” — एक को छोड़कर हर श्लोक इसी प्रश्न पर समाप्त होता है। यही टेक स्तोत्र को उसका नाम देती है।
परंपरा इसे स्वयं भगवान शिव का कहा मानती है — ऊर्ध्वाम्नाय तंत्र में पार्वती से हुए संवाद के रूप में। कोई मानव रचयिता नहीं है, और पाठ कई शताब्दी पुराना है।
सबसे प्रचलित रूप तेरह श्लोकों का है। अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो पाठ का फल बताता है। कुछ छपे संस्करणों में श्लोक अधिक हैं या क्रम अलग है।
यह वृंदावन के मंदिरों में और ब्रज के गाँवों में रोज़ पढ़ा जाता है। साधु और बुज़ुर्ग भक्त इसे कंठस्थ रखते हैं — किसी संस्कृत स्तोत्र के लिए यह असाधारण अपनापन है।
श्री हित हरिवंश महाप्रभु की इस परंपरा में श्री राधा उपासना के केंद्र में हैं, कृष्ण के साथ नहीं। पूरा का पूरा राधा को संबोधित स्तोत्र इसी मार्ग के हृदय में बैठता है।
उनके नयनों के कोर से गिरती चितवन से नंदनंदन निरंतर वश में रहते हैं। स्तोत्र का सिद्धांत यहीं है — मोहित करने वाले नहीं, मोहित होने वाले कृष्ण।
ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे
श्रीराधिके नमोस्तुते॥
केवल यही श्लोक क्रम तोड़ता है। यहाँ प्रश्न नहीं है — बारह बार ईश्वरी कहकर सीधा प्रणाम है।
हो सके तो स्नान करके, अपने राधा-कृष्ण चित्र या आसन के सामने बैठिए, और स्वर में पढ़िए। बहुत भक्त दिन में एक पाठ करते हैं, कुछ कई दिनों की शृंखला बनाते हैं।
सूर्योदय से पहले का समय परंपरा की पसंद है और वृंदावन के भक्त वही रखते हैं। संध्या भी उतनी ही ठीक है। जो समय आप सचमुच निभाएँगे, वह आदर्श समय से बड़ा है।
ब्रज भर के भक्त बिना संस्कृत पढ़े इसका पाठ करते हैं। अर्थ एक बार पढ़ लीजिए ताकि पता रहे आप माँग क्या रहे हैं — उसके बाद पाठ स्वयं चलता है।
पाठ के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है और किसी को कुछ देना नहीं है। जो इसके नाम पर पैसा माँगे, उसका इस परंपरा से कोई संबंध नहीं।
पूरा स्तोत्र एक-एक श्लोक करके, हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ — फोन से सीधे पाठ कर सकें, इस तरह रखा गया है।