तेरह वर्ष की आयु में
घर छोड़ दिया

वृंदावन के श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज की कथा, आरंभ से आज तक।

1971

जन्म-नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय

कानपुर ज़िले के सरसौल ब्लॉक का अखरी गाँव। एक ब्राह्मण परिवार, उपनाम पांडेय। नाम रखा गया अनिरुद्ध।

जहाँ भक्ति असामान्य नहीं थी

दादा पहले ही संन्यास ले चुके थे। पिता भक्त थे। गीता और दैनिक पाठ किसी आयोजन के बजाय संध्या का सामान्य हिस्सा थे।

1985

बिना बताए निकल गए

तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ा और संन्यास लिया। वे कभी लौटे नहीं।

इसके बाद वर्षों तक कुछ नहीं था

न पैसा, न पहले से तय कोई आश्रय। उन्होंने इस समय को कभी सजाकर नहीं सुनाया।

1980 का दशक और 1990 का दशक

वाराणसी में गंगा के वर्ष

घाटों पर वर्ष बीते। खुले में सर्दियाँ, नदी में स्नान, और केवल जप तथा अध्ययन।

वृंदावन और दीक्षा

वे वृंदावन पहुँचे, श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज से मिले और राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षा पाई।

वही एक घंटा, भोर से पहले

श्री हित राधा केलि कुंज में प्रतिदिन सत्संग। वही कुछ निर्देश, वही समय, वही गली में लगी कतार।

2020 का दशक

छोटे उत्तर दूर तक पहुँचे

मोबाइल कैमरे सत्संग तक पहुँचे। वृंदावन की एक छोटी सभा के उत्तर देश-विदेश तक जाने लगे।

वे माँगते क्या हैं

केवल राधा नाम। न शुल्क, न दीक्षा की शर्त, न कोई निश्चित समय, और न कोई वस्तु खरीदने की आवश्यकता।

पूरी कथा, तारीखों के साथ

जन्म, गुरु, परंपरा और वे बातें जिन्हें दूसरी साइटें ग़लत दोहराती हैं — सब एक पेज पर।

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