वृंदावन के श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज की कथा, आरंभ से आज तक।
कानपुर ज़िले के सरसौल ब्लॉक का अखरी गाँव। एक ब्राह्मण परिवार, उपनाम पांडेय। नाम रखा गया अनिरुद्ध।
दादा पहले ही संन्यास ले चुके थे। पिता भक्त थे। गीता और दैनिक पाठ किसी आयोजन के बजाय संध्या का सामान्य हिस्सा थे।
तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ा और संन्यास लिया। वे कभी लौटे नहीं।
न पैसा, न पहले से तय कोई आश्रय। उन्होंने इस समय को कभी सजाकर नहीं सुनाया।
घाटों पर वर्ष बीते। खुले में सर्दियाँ, नदी में स्नान, और केवल जप तथा अध्ययन।
वे वृंदावन पहुँचे, श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज से मिले और राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षा पाई।
श्री हित राधा केलि कुंज में प्रतिदिन सत्संग। वही कुछ निर्देश, वही समय, वही गली में लगी कतार।
मोबाइल कैमरे सत्संग तक पहुँचे। वृंदावन की एक छोटी सभा के उत्तर देश-विदेश तक जाने लगे।
केवल राधा नाम। न शुल्क, न दीक्षा की शर्त, न कोई निश्चित समय, और न कोई वस्तु खरीदने की आवश्यकता।
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