क्रोध, तुलना, अकेलापन और घर — उनके सत्संग की वही पंक्तियाँ, जो बार-बार लौटती हैं।
क्रोध को दूसरा विचार मत दो।
पहला विचार अपने आप आता है। दूसरा आप देते हैं, और क्रोध वहीं से बढ़ता है।
मन को समस्या मत दो, नाम दो।
खाली मन जो मिलता है उसी को चबाता रहता है। रात दो बजे वह समस्या आप ही देते हैं।
दूसरे का जीवन बाहर से देखकर अपना मत तौलो।
आप अपना भीतर जानते हैं और दूसरे का केवल बाहर देखते हैं। यह तुलना बराबरी की है ही नहीं।
जिसने दुख दिया वह आगे बढ़ गया, किराया तुम भर रहे हो।
बैर पालना उस व्यक्ति को कुछ नहीं करता। जगह आपके भीतर घिरती है।
बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं, जो सुनाया जाता है वह नहीं।
घर में जो सचमुच होता है, वही आगे जाता है। उपदेश नहीं।
भक्ति जो घर में कलह बनाए, उसने खुद को नहीं समझा।
यदि साधना से घर में तनाव बढ़ रहा है तो कहीं समझ छूट रही है।
अकेलेपन में भी नाम साथ है, कमरा कभी खाली नहीं होता।
वे अकेलेपन को छोटा नहीं बताते। वे बस कहते हैं कि उस समय भी कुछ हाथ में है।
जहाँ फ़ोन रहता था, वहाँ माला रख दो।
हाथ जिस चीज़ तक अपने आप पहुँचता है, उसे बदल देना सबसे व्यावहारिक सलाह है।
बीमारी में वैद्य के पास जाओ, नाम साथ में लो।
वे इलाज के बदले कुछ नहीं देते। नाम इलाज के साथ चलता है, उसकी जगह नहीं लेता।
घटना और प्रतिक्रिया के बीच जो जगह बनती है, वही पहला फल है।
पहला बदलाव अनुभव में नहीं, व्यवहार में दिखता है — उस छोटे से विलंब में।
हर पंक्ति के साथ यह भी कि वे ऐसा क्यों कहते हैं, और उसे रोज़ के जीवन में कैसे उतारा जाए।